'अंतर ख़त्म करने की कोशिश'
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वित्त वर्ष 2009-10 के लिए संसद में पेश बजट की तारीफ़ की है.
उन्होंने कहा कि वैश्विक मंदी के दौर में इस बजट से संतुलन बनाने की कोशिश की गई है ताकि सरकार का घाटा भी कम हो और साथ-साथ बुनियादी संरचना के विकास में सरकारी निवेश भी बढ़े.
प्रधानमंत्री ने ख़ास तौर पर सामाजिक क्षेत्र के लिए उठाए गए क़दमों का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा), भारत निर्माण योजना और सिंचाई पर निवेश बढ़ाने से गाँवों का विकास होगा.
मनमोहन सिंह का कहना था, "हमारी कोशिश है कि ग़रीबी - अमीरी के बीच की खाई कम हो जाए. मैं महसूस करता हूं कि यह बजट भारत और इंडिया के बीच के अंतर को कम करने की कोशिश है."
जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास योजना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने भारत को स्लम मुक्त बनाने का लक्ष्य बनाया है. उन्होंने कहा कि इस योजना से शहरों की बुनियादी संरचना को मज़बूत बनाने में मदद मिलेगी.
मनमोहन सिंह ने कहा कि उनकी सरकार आर्थिक विकास में समाज के सभी तबकों को भागीदार बनाना चाहती है. उन्होंने ख़ास तौर पर खाद्य सुरक्षा क़ानून का ज़िक्र किया.
इस योजना के तहत ग़रीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों को हर महीने 25 किलोग्राम अनाज तीन रूपए प्रति किलो की दर से दिया जाएगा.
प्रधानमंत्री ने कहा, "इस प्रस्तावित क़ानून को हम चर्चा के लिए पेश कर रहे हैं. जल्दी ही इसका प्रारुप सामने होगा. इसीलिए वित्त मंत्री ने अपने बजट में इस योजना के मद में किसी राशि का प्रावधान नहीं किया है."
सरकारी कंपनियों में विनिवेश के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा, "यह वैश्विक आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करेगा. हम समय के साथ इस दिशा में आगे बढ़ेंगे."
ग़ौरतलब है कि संसद में पेश में आर्थिक सर्वेक्षण में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी आम जनता को बेचने की सिफ़ारिश की गई है और अनुमान लगाया गया है कि इससे सालाना 25 हज़ार करोड़ रूपए की उगाही हो सकती है जिसका इस्तेमाल आर्थिक विकास में हो सकता है.


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