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    बजट कम घोषणाएँ ज़्यादा

    By Staff
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    बजट कम घोषणाएँ ज़्यादा

    आलोक पुराणिक

    आर्थिक मामलों के जानकार

    बजट भाषण आम तौर पर दूसरे भाषणों से अलग माना जाता है, इसमें ठोस आंकड़ों की बात होती है.

    ठोस अनुमानों की बात होती है. पर 2009-10 के आम बजट के भाषण को देखें, तो पता लगता है कि इसमें बजट कम है, भाषण ज़्यादा है.

    खर्चों के पक्के इंतज़ाम हैं, पर आय के इंतज़ाम पक्के नहीं हैं. मध्य वर्ग को जो आयकर में राहत मिली वो भी सिर्फ़ नाम के लिए ही है. पुरुषों के लिए डेढ़ लाख रुपए की आय की बज़ाय अब एक लाख 60 हज़ार रुपए तक की आय कर मुक्त रहेगी.

    महिलाओँ को भी दस हजार ज्यादा रुपए की छूट दी गई है. ये छूट हाल के दौर की महंगाई को देखते हुए नाकाफी है.

    राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के बजट में 144 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी समझ में आती है, पर जो समझ में न आने वाले आंकड़े हैं, वो ये हैं कि वित्त मंत्री नौ प्रतिशत विकास की बात कर रहे हैं.

    इसमें कृषि क्षेत्र में चार फ़ीसदी से ज्यादा विकास की उम्मीद नहीं है. सर्विस क्षेत्र की हालत खस्ता है. उद्योग जगत इस बजट से निराश है. फिर 9 प्रतिशत की विकास दर आएगी कहां से.

    सर्विस क्षेत्र के हाल के आंकड़े बहुत आशाजनक नहीं हैं. हाल के महीनों में वहां से होने वाली कर वसूली में कमी दर्ज की गयी है. बजट का सबसे डराने वाला आंकड़ा है -राजकोषीय घाटे में बढ़ोत्तरी. यह आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के छह प्रतिशत से ऊपर चला गया है.

    यह घाटा कैसे कम होगा, इस के बारे में कोई पक्की योजना सरकार के पास नहीं है. राजकोषीय घाटे में कमी के उपाय किए जाएंगे, पर यह सब कैसे होगा, ऐसी कोई कार्ययोजना इस बजट में वित्त मंत्री ने पेश नहीं की है.

    आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया था कि विनिवेश प्रक्रिया से हर साल 25 हज़ार करोड़ रुपए उगाहे जा सकते हैं. पर बजट ने इस संबंध में कुछ भी नहीं बताया है.

    कर ढांचे में कोई बदलाव नहीं किए गए हैं. थोड़ी बहुत फेरबदल अप्रत्यक्ष कर ढांचे में किए गए हैं, जिनसे 2000 करोड़ रुपए अतिरिक्त उगाहे जाने की उम्मीद है.

    बजट भाषण में वित्त मंत्री ने इस बात पर चिंता जताई की गांवों में लोग साहूकारों से कर्ज लेते हैं, इससे कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं. इन समस्याओं के अध्ययन के लिए एक कमेटी गठित की गई है. कुछ साल पहले ही राधाकृष्ण कमेटी ने इस तरह की समस्याओं का विशद अध्ययन करके महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं. वे सिफारिशें धूल खा रही हैं. एक और कमेटी इस सिलसिले में काम करेगी.

    बजट में हर साल 1.2 करोड़ रोज़गार पैदा करने की बात कही गई है. पर ये रोजगार आएंगे कहां से, यह साफ नहीं है. कुल मिलाकर इस बजट में घोषणाएं बहुत हैं.

    वैसे भी बजट के दो दिन पहले पेट्रोलियम उप्तादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी से साफ यह हुआ है कि बजट से जुड़ी घोषणाओं को बजट से पहले या बाद में करना ही राजनीतिक तौर पर श्रेयस्कर होता है.

    यूं शेयर बाजार के रुख के आधार पर बजट का विश्लेषण ठीक नहीं होता, पर बजट के बाद शेयर बाज़ार ने जिस तरह से गोता लगाया है, उससे यह भी साफ होता है कि स्टॉक कारोबारियों को यह समझ में आ गया है कि बहुत उम्मीदें सरकार से लगाना ठीक नहीं है. मध्यवर्गीय निवेशक के लिए इस बजट में कुछ भी नहीं है, सिवाए दस हजार रुपए की कर छूट सीमा के.

    पर मुद्दा यह नहीं है.

    कृषि क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र के लिए तय रकम का जुगाड़ इस मंदी की अर्थव्यवस्था में कैसे किया जाएगा, यह भी अभी साफ नहीं है. राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के बजट में ज़बर्दस्त बढोत्तरी के बाद यह साफ होता है कि अब इस स्कीम की कार्यकुशलता के मसलों पर गंभीरता से विचार किया जाए.

    यह अब कोई छोटी मोटी स्कीम नहीं है. अरबों के निवेश वाली ऐसी स्कीम है, जिसमें भारी निवेश होता है, और जिसके गहरे आर्थिक और राजनीति निहितार्थ हैं.

    कुल मिलाकर चिंता का मसला यह है कि क्या बजट के इन आंकड़ों को फाइनल मान लिया जाए या साल के बीच में भी सरकार कुछ और परिवर्तन कर सकती है. फिलहाल तो यह बजट कम भाषण ज्यादा है.

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