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मायावती को गिरफ़्तारी की आशंका

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मायावती को गिरफ़्तारी की आशंका

शनिवार को लखनऊ में पार्टी सांसदों, विधायकों और अन्य पदाधिकारियों की बैठक को संबोधित करते हुए मायावती ने दोहराया कि ऎसी स्थिति में एक दलित ही मुख्यमंत्री बनेगा न कि पार्टी के अन्य नेता जैसे सतीश मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या.

उनके इस बयान से पार्टी में एक बार फिर मायावती के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएँ शुरू हो गई हैं.

पार्टी में लोगों की निगाहें मायावती के स्वजातीय युवा नेता राजाराम पर हैं जो इस समय राज्य सभा के सदस्य हैं. राजाराम पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके हैं.

सन 2002 में मायावती उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन सरकार चला रही थीं. उसी समय आगरा के ताज कॉरिडोर में कथित गैरकानूनी निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने मायावती, उनके सहयोगी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू की थी.

मायावती ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था. इसके बाद बीएसपी दो फाड़ हो गई और बागी गुट के सहयोग से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने थे.

ताज कॉरिडोर

अगर मुझे गिरफ़्तार किया जाता है तो ऎसी स्थिति में एक दलित ही मुख्यमंत्री बनेगा न कि पार्टी के अन्य नेता जैसे सतीश मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या. मायावती

अगर मुझे गिरफ़्तार किया जाता है तो ऎसी स्थिति में एक दलित ही मुख्यमंत्री बनेगा न कि पार्टी के अन्य नेता जैसे सतीश मिश्र, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या.

ताज कॉरिडोर निर्माण की जांच के दौरान ही सीबीआई ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति बटोरने का मामला दर्ज किया था.

सीबीआई ने ताज कॉरिडोर मामले में मायावती के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन उस समय गवर्नर ने मायावती पर मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं थी दी जिसके खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील दायर है.

उधर सीबीआई ने आय से अधिक मामले में भी चार्जशीट तैयार कर ली है. सीबीआई का कहना है कि मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं.

लेकिन लोक सभा चुनाव से पहले मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर कर मुकदमा खारिज करने की मांग की थी. इसके चलते सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं की. अब अगले हफ़्ते 13 जुलाई को इसी मामले की सुनवाई निर्धारित है.

कानून के जानकारों का कहना है कि आपराधिक मामले की विवेचना के दौरान कोर्ट हस्तक्षेप नही कर सकती.

लोक सभा चुनाव के बाद बदली राजनीतिक परिस्थिति में इधर कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ़ फैसले दिए हैं.

इसे देखते हुए अनुमान लगाए जा रहे हैं कि सीबीआई को जल्दी ही मायावती के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति मिल सकती है.

दलित मुख्यमंत्री

आम तौर पर चार्ज शीट दाखिल करने से पहले अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया जाता है, जैसा लालू यादव के केस में हुआ था.

पर प्रेक्षकों का कहना है कि केंद्र में सतारूढ़ पार्टी ऐसा करके मायावती को राजनीतिक लाभ नही लेने देगी. ऐसे में विकल्प ये है कि चार्ज शीट कोर्ट में दाखिल की जाए और कोर्ट ही अभियुक्त को सम्मन जारी करे.

मगर कोर्ट में हाज़िर होने से पहले इस्तीफा देना पड़ सकता है जैसा उमा भारती के मामले में हुआ था.

प्रेक्षकों का कहना है कि मायावती इसी आशंका से डरी हुई हैं और इस प्रयास में हैं कि ऎसी नौबत आने पर पार्टी एकजुट रहे.

अपने सवा तीन घंटे के भाषण में मायावती ने अपने राजनीतिक गुरु स्वर्गीय कांशी राम का हवाला देते हुए कहा कि विपक्ष उनके खिलाफ मनी , माफिया , मीडिया और जुडीशियरी का इस्तेमाल कर सकता है.

पार्टी नेताओं का हौसला बढ़ाने की कोशिश करते हुए मायावती ने कांग्रेस पार्टी को चेतावनी दी कि अगर ऐसा हुआ तो वह इंदिरा गांधी कि तरह दोबारा सत्ता में आएँगी. उन्होंने एक बार फिर अपने को भावी प्रधानमंत्री की तरह पेश किया.

मायावती को एहसास है कि दो साल की उनकी सरकार से दलित समुदाय भी संतुष्ट नहीं है. इसीलिए दलित कार्ड खेलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी अनुपस्थिति में बहुजन समाज पार्टी एक दलित को ही उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाएगी.

मायावती के इस बयान से पहले कहा जा रहा था कि कैबिनेट मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा अस्थायी व्यवस्था के तहत मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

मगर मायावती के बयान से अब कुशवाहा , सतीश मिश्र , नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्या की संभावनाओं पर विराम लग गया है और राजाराम का नाम ऊपर आ गया.

पिछली बैठक में मायावती ने कहा था कि उनकी गिरफ्तारी की स्थिति में राजाराम और बाबू सिंह कुशवाहा से मार्गदर्शन प्राप्त किया जाए. कुशवाहा विश्वास प्राप्त तो हैं पर वह दलित न होकर पिछड़ी जाति से हैं.

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