रोटी की खातिर हर रोज जिंदगी दांव पर लगाते हैं बच्चे
दादर से अमृतसर की ओर जाने वाली पठानकोट एक्सप्रेस जब हबीबगंज से भोपाल स्टेशन के बीच होती है तब कई बोगियों के दरवाजे पर उन लोगों का कब्जा नजर आता है जो हर रोज होशंगाबाद और उसके आस पास के इलाकों से बोरी में प्लास्टिक का कबाड़ भरकर भोपाल बेचने आते हैं।
जैसे ही यह ट्रेन हबीबगंज स्टेशन से मुख्य स्टेशन की तरफ बढ़ती है, हर टोली में से एक-एक बच्चा जिसकी उम्र बमुश्किल 10 से 12 साल की होती है, दरवाजे के पास वाली खिड़की पर लटक जाता है। जैसे ही ट्रेन एक नियत स्थान पर आकर धीमी होती है, वह सहयोगियों की मदद से एक-एक बोरी को तय स्थान पर फेंकने का सिलसिला शुरू कर देता है ।
अपनी जान को जोखिम में डालने वाला साहिल (परिवर्तित नाम) बताता है कि वह अपने साथियों के साथ रोज होशंगाबाद से प्लास्टिक का कबाड़ बेचने भोपाल आता है। वह अगर इन बोरियों को स्टेशन पर उतारता है तो मुसीबत में पड़ जाता है। पुलिस परेशान करती है और उसके पास यह जवाब नहीं होता कि वह कबाड़ कहां से लाया है।
साहिल बताता है कि वह अकेला नहीं है जो रोज खतरों से खेलकर रोटी कमाता है। उसके साथ और भी कम उम्र के लड़के और लड़कियां हैं। पांच से सात सदस्यों वाली इन टोलियों के परिवारों की रोजी रोटी प्लास्टिक के कबाड़ से होने वाली आमदनी से चलती है।
राजकीय रेलवे पुलिस भोपाल ने प्लेटफार्म पर आवारा और लावारिस घूमने वाले बच्चों के पुनर्वास की मुहिम चला रखी है। मगर ये बच्चे उस मुहिम से दूर हैं।
पुलिस अधीक्षक रेलवे जी़ क़े पाठक बताते हैं कि उन्होंने पिछले दिनों एक सर्वेक्षण कराया था जिसमें पाया गया कि भोपाल के स्टेशनों पर घूमने वाले आवारा बच्चों की संख्या 200 है। इनमें से 102 का पुनर्वास किया जा चुका है। वे भरोसा दिलाते हैं कि उनका लक्ष्य है कि कोई भी आवारा बच्चा ट्रेन और प्लेटफार्म पर न रहे। खतरों से खेलकर रोटी कमाने वाले बच्चों पर भी अब उनकी नजर होगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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