आर्थिक मंदी ने छीने लाखों के रोज़गार

आर्थिक मंदी ने छीने लाखों के रोज़गार

ये सर्वेक्षण मात्र 121 कंपनियों में हुई छटनी का है, अगर पूरे निर्यात क्षेत्र की बात करें तो बताया जाता है कि कम से कम 50 लाख लोगों को आर्थिक मंदी के चलते अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है.

ये आंकड़ा उन लोगों का बताया जाता है जो इस क्षेत्र से सीधे जुङे हैं. लेकिन परोक्ष रुप से जुड़े लोगों की संख्या जो आर्थिक मंदी से प्रभावित हुए हैं और अपने रोज़गार खो बैठे हैं, इस आंकङे में जो़ड़ दी जाए तो ये संख्या कहीं ज़्यादा है.

निर्यात क्षेत्र में रोज़गार जाने या कम होने की बात की जाए तो कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, हथकरघा और सूचना प्रद्योगिकी जैसे उद्योग सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं.

कपड़ा उद्योग

जब अपने अंतिम वर्ष की पढाई कर रहा था तो मुझे एचसीएल में प्लेसमेंट मिल गई थी पर जब मेंरी पढाई पूरी हुई तो आर्थिक मंदी का दौर शुरु हो गया और हमारी ज्वाईनिंग की तारिख़ टलती गई मोहित पति, छात्र

जब अपने अंतिम वर्ष की पढाई कर रहा था तो मुझे एचसीएल में प्लेसमेंट मिल गई थी पर जब मेंरी पढाई पूरी हुई तो आर्थिक मंदी का दौर शुरु हो गया और हमारी ज्वाईनिंग की तारिख़ टलती गई

भारत में निर्यात क्षेत्र में सबसे बड़ा उद्योग कपड़ा उद्योग है. भारतीय निर्यात संगठन के संयोजक सुभाष मित्तल का कहना है कि हालात अभी सुधरे नहीं हैं, बल्कि और बिगड़ने का डर है.

सुभाष मित्तल का कहना है, "कहा जा रहा है कि कपड़ा उद्योग में 50 लाख लोगों की नौकरियां गई हैं. लेकिन कम से कम लगभग 10 लाख नौकरियां इस क्षेत्र में गई ही हैं. इसकी वजह है अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मांग कम हुई है और जो मांग है भी वो सस्ती दरों पर है. मतलब है कि लागत ज़्यादा है और मांग है नहीं नतीज़ा, उद्योगों को अपनी लागत नीचे लाने के लिए क़दम उठाने पड़ रहे हैं."

इस उद्योग में बड़ी तादाद में लोगों ने रोज़गार खोए हैं और जिन लोगों ने रोज़गार खोए हैं, उसमें सबसे बड़ी संख्या आम मज़दूर की है. ऐसा क्यूं है कि आर्थिक मंदी की मार भी सबसे पहले उस पर पड़ी जिसमें ये मार झेलने की सबसे कम क्षमता है.

सुभाष मित्तल कहते हैं, "कोई भी उद्योग पिरामिड की तरह काम करता है, और जब उद्योग के पास काम नहीं होता तो सबसे पहले मज़दूर की ही नौकरी जाती है, क्यूंकि मज़दूरों की जो भी तादाद हो आपको मैनेजर, क्वालिटी मैनेजर जैसे लोग तो रखने ही होते हैं, तो पहली मार मजदूरों पर ही पड़ती है."

निर्यात क्षेत्र

निर्यात क्षेत्र से जुड़े जहां लाखों ऐसे लोग हैं जिनपर आर्थिक मंदी की मार पड़ी है, वहीं ऐसे लोग भी हैं जो सीधे तौर पर तो इस क्षेत्र से जुङे उद्योगों में काम नहीं करते हैं पर उनकी जीविका इस क्षेत्र से आती है.

निर्यात क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण उद्योग है आभूषण उद्योग. प्रगीत शर्मा जो आभूषण तैयार करने वाली एक पूरी फ़ैक्ट्री चलाते हैं कहते हैं कि किस तरह से एक छोटी सी मोतीयों की माला बनाने में या फिर कोई शो पीस बनाने में कितने लोग शामिल होते हैं.

प्रगीत शर्मा बताते हैं कि कुछ लोग तो सीधे उनके कारखाने में आकर काम करते हैं, लेकिन आभूषण उद्योग में काफी काम एसा होता है जो गांवों में वो परिवार करते हैं जिनका ये पुश्तैनी काम है. आर्थिक मंदी के चलते आभूषणों की मांग में भारी गिरावट आई है और परिणाम स्वरुप जहाँ लोगों के रोज़गार गए जो सीधे कारखाने में काम करते हैं वहीं ऐसे हज़ारों परिवारों की जीविका छिन गई है जो पुश्तैनी काम के तौर पर आर्डर पर काम करते हैं.

निर्यात क्षेत्र पर आर्थिक मंदी और उसके प्रभाव के चलते इस क्षेत्र में रोज़गार जाने की बात हो और सूचना प्रद्योगिकी की बात ना तो बात अधूरी रह जाएगी.

सूचना प्रद्योगिकी

आईटी बूम ने भारत के लाखों नौजवानो को हज़ारों सपने दिए, लाखों नौजवानों के सपने पूरे भी हुए. जब तक आर्थिक मंदी की मार शुरु नहीं हुई थी. इस क्षेत्र में नौ प्रतिशत प्रति तिमाही रोज़गार बढ रहे थे जो अब घट कर 2.3 प्रतिशत रह गया है.

मोहित पति ने जब सॉफ्टवेयर इंजिनयरिंग की पढ़ाई शुरु की थी तो सपने कुछ और ही थे और सपने लगभग हक़िकत में बदल ही गए थे पर फिर आर्थिक मंदी की ऐसी नज़र लगी की बस सब कुछ मिनट में काफ़ूर हो गया.

वो कहते हैं, "मै जब अपने अंतिम वर्ष की पढाई कर रहा था तो मुझे एचसीएल में प्लेसमेंट मिल गई थी पर जब मेरी पढाई पूरी हुई तो आर्थिक मंदी का दौर शुरु हो गया और हमारी ज्वाईनिंग की तारिख़ टलती गई. एक साल हो चुका है, अब मैं एमबीए की तैयारी कर रहा हूं, शायद इसका बाद कोई अच्छी नौकरी मिल जाए."

कुल मिलाकर हालात सूचना प्रद्योगिकी क्षेत्र के भी अभी अच्छे नहीं, कयोंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हालात अच्छे नहीं हैं. जब तक हालात ना सुधरें तब तक क्या किया जाए. निर्यात क्षेत्र के लोगों ने सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं. सरकार ने आश्वासन दिए हैं.

पर इस क्षेत्र से जु़ड़े एक व्यक्ति ने कहा निर्यात का क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद का मामूली हिस्सा है. सरकार की प्राथमिकताओं में उसका नंबर काफी नीचे है.

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