पश्चिम बंगाल हिंसा में 6 लोगों की मौत

पश्चिम बंगाल के लालगढ़ इलाक़े में संदिग्ध माओवादी विद्रोहियों ने सत्तारुढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के छह कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी है. पार्टी के छह अन्य कार्यकर्ता अभी लापता बताए जा रहे हैं.
उधर विद्रोहियों की मदद से गाँव वालों ने सड़कों पर जाम लगा दिया है, जिससे सुरक्षा बल उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं.
आदिवासियों के प्रभाव वाला लालगढ़ क्षेत्र पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर ज़िले में है और वहाँ पर पिछले साल नवंबर महीने से ही माओवादी विद्रोहियों का नियंत्रण रहा है.
पिछले कुछ दिनों में विद्रोहियों की मदद से गाँव वालों ने उस क्षेत्र में और ज़्यादा गाँवों पर क़ब्ज़ा कर लिया है. साथ ही उन्होंने माकपा के कार्यालयों को आग लगा दी और उन्हें ध्वस्त कर दिया.
मंगलवार सुबह संदिग्ध माओवादियों ने माकपा के तीन कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी. वे तीनों माओवादी एक मोटर साइकिल पर वहाँ पहुँचे थे और उन्होंने उन लोगों पर गोलियाँ चला दी थीं. पुलिस के अनुसार उस समय वे तीनों कार्यकर्ता वहाँ एक चाय की दुकान पर थे.
रुकावट
लालगढ़ में माओवादियों ने अब सड़कों पर गश्त शुरू कर दी है. गाँव वालों ने पेड़ काटकर लालगढ़ की ओर जाने वाले आठ रास्तों पर रुकावटें खड़ी कर दी हैं, जिससे सुरक्षा बल वहाँ नहीं पहुँच सकें.
इसके बाद ख़बरें हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार ने एक हज़ार और अर्द्धसैनिक बलों की माँग की है जिससे वे लालगढ़ पर क़ब्ज़ा कर सकें. सैनिक वहाँ पहुँचने भी लगे हैं मगर अभी ये अस्पष्ट है कि वे उस क्षेत्र में प्रवेश कब करेंगे.
ख़बरों के अनुसार पुलिस के उस क्षेत्र से जाने के बाद से ही वहाँ सशस्त्र विद्रोही सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं. कोलकाता में मौजूद बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली का कहना है कि सैकड़ों की संख्या में माकपा कार्यकर्ता लालगढ़ क्षेत्र छोड़कर भाग गए हैं. माओवादियों ने इसे पश्चिम बंगाल का पहला 'आज़ाद क्षेत्र' बताया है.
असंतोष
लालगढ़ क्षेत्र में माकपा का अंतिम गढ़ है धरमपुर जहाँ पुलिस की एक चौकी पर आग लगा दी गई और माओवादियों ने एक स्थानीय कम्युनिस्ट नेता का घर गिरा दिया. लालगढ़ में कई महीनों से असंतोष रहा है.
वहाँ हिंसा पिछले साल नवंबर में तब शुरू हुई थी जब पुलिस ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य की हत्या की कोशिश के आरोप में कुछ स्थानीय लोगों को गिरफ़्तार किया था.
उस समय मुख्यमंत्री संदिग्ध माओवादियों के एक हमले में बाल-बाल बचे थे. उसके बाद गिरफ़्तारियों का विरोध करने के लिए 'पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज़' यानी पीसीपीए नाम से एक संगठन बना था.
उन लोगों ने हिंसक प्रदर्शन और स्थानीय पुलिस के विरुद्ध हमले किए हैं. उसी समय से लालगढ़ क्षेत्र में पुलिस और प्रशासन का नियंत्रण लगभग नहीं के बराबर रहा है. हाल के आम चुनाव के समय तो वहाँ पर मतदान केंद्र भी नहीं बनाए जा सके थे.
यहाँ सीपीएम और माओवादियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चलती रही है लेकिन पिछले कुछ सालों में माओवादियों का दखल बढ़ा है.


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