ये उत्तराधिकार की लड़ाई है

अगर आत्ममंथन की चिंता इन लोगों को होती, तो एक सप्ताह बाद भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने वाली है, ये लोग इसका इंतज़ार करते और अपनी बात उठाते.
ये लड़ाई इसलिए हो रही है कि लालकृष्ण आडवाणी के बाद कौन पार्टी का नेतृत्व करे, कौन आगे आए, किसका कितना महत्व हो, कौन संसद के अंदर विपक्ष का नेतृत्व करे और कौन संगठन के अंदर पार्टी के नेतृत्व करे.
दरअसल लड़ाई इसके लिए हैं. जसवंत सिंह इस बात से विचलित हैं कि वो पहले राज्यसभा में विपक्ष के नेता था.
भूमिका
अब वे लोकसभा में आ गए हैं. लेकिन यहाँ आकर वे महत्वहीन हो चुके हैं और उनकी कोई भूमिका नहीं बची है. शायद ये पहली बार है कि उनके पास संसदीय दल का कोई पद नहीं है.
जसवंत सिंह को भी कोई भूमिका नहीं मिली है
वे अटल बिहारी वाजपेयी के समय लोकसभा में उपनेता थे और फिर राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने. अब उनके महत्वहीन होने की तकलीफ़ साफ़ है.
जहाँ तक यशवंत सिन्हा का प्रश्न है, उनको भी पहले से दिक्कत रही. पहले से ही आडवाणी को लेकर उन्होंने विरोधी स्वर उठाए हैं.
अब उनको लगता है कि इस बार भी उनकी अनदेखी हुई है. नए संसदीय दल के अंदर जो प्रभार बँटे हैं, उसमें उनका कोई महत्व नहीं है, उनकी कोई भूमिका नहीं है.
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे महत्वपूर्ण मंत्री थे. अब तो वे पहली पंक्ति से पीछे चले गए हैं. कहीं न कहीं अपना महत्व खोने की पीड़ा दोनों नेताओं की है.
(बीबीसी संवाददाता रूपा झा के साथ बातचीत पर आधारित)


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