'राजपक्षे सत्ता की भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध'
नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अल्पसंख्यकों के साथ सत्ता की भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध है। यह धारणा जापान सरकार की है जिसके विशेष दूत यासुशी अकाशी ने इस सप्ताह राजपक्षे के साथ विस्तृत बातचीत की।
राजपक्षे ने अकाशी को सुबह के नाश्ते पर बताया कि वह महसूस करते हैं कि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के परास्त हो जाने अर्थ तमिलों की तकलीफों का अपने आप हल होना नहीं है जिनकी वजह से जातीय संघर्ष शुरु हुआ था।
राजपक्षे-अकाशी की बैठक की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने आईएएनएस को बताया कि राष्ट्रपति संभवत: ऊपरी सदन का उपाय आजमा सकते हैं जहां अल्पसंख्यक विशेष तौर पर तमिलों और मुस्लिमों को बेहतर प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।
समझा जाता है कि राजपक्षे ने अकाशी से कहा कि वह महसूस करते हैं कि श्रीलंका के 90 प्रतिशत लोग उनके साथ हैं, जहां सिंहलियों के ताकतवर नेता तमिलों को किसी भी तरह की रियायत देने के खिलाफ हैं क्योंकि वे मानते हैं कि इससे घरेलू तनाव बढ़ेगा।
राजपक्षे की दलील है कि 225 सदस्यीय संसद में उनके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है जो संवैधानिक बदलावों के लिए जरूरी है और अगर उन्हें जल्दबाजी की तो वह लड़खड़ा सकते हैं। यही वजह है कि राजपक्षे राष्ट्रपति पद के चुनाव या संसदीय चुनाव कराने से पहले जाफना और वावूनिया जैसे तमिल बहुल इलाकों में चुनाव कराना चाह रहे हैं।
पिछले महीने लिट्टे प्रमुख वी. प्रभाकरन और उसके सभी प्रमुख सहयोगियों के मारे जाने और लिट्टे की हार होने के बाद अकाशी की राजपक्षे से यह पहली भेंट थी।
लिट्टे के पतन के बाद राजपक्षे ने एकीकृत श्रीलंका का संकल्प लिया था लेकिन लिट्टे के साथ संबंध नहीं रखने वाले तमिलों को भी श्रीलंका सरकार की गंभीरता पर संदेह था।
श्रीलंका जापान से विशेष सहायता चाहता है ताकि वे बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त फौजियों को देश में बिछी बारूदी सुरंगे हटाने के काम में लगा सके। अकाशी ने ने कुछ विस्थापित शिविरों का दौरा कर वहां उपलब्ध सुविधाओं का जायजा लिया। श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच 2002 में संघर्षविराम समझौता कराने वालों में जापान के अलावा अमेरिका,यूरोपीय संघ और नार्वे भी शामिल थे। लेकिन पश्चिमी देशों की तरह जापान ने कभी भी तमिल विद्रोहियों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखाई।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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