ईरान: राजनीतिक व्यवस्था और संस्थाएँ

ईरान: राजनीतिक व्यवस्था और संस्थाएँ

मतदाता

ईरान की जनसंख्या क़रीब साढ़े छह करोड़ है. इनमें से 18 साल से अधिक की आयु वाले मतदाताओं की संख्या क़रीब चार करोड़ 60 लाख है. कुल मतदाताओं में से क़रीब 80 लाख मतदाताओं का जन्म 1979 में हुई क्रांति के बाद हुआ है.

ईरान में क़रीब चार करोड़ साठ लाख मतदाता है

वर्ष 1997 के चुनाव में सबसे अधिक 80 फ़ीसदी लोगों ने मतदान किया था जो कि अब तक का रिकॉर्ड है.

इस चुनाव में सुधारवादी नेता मोहम्मद ख़ातमी को ऐतिहासिक जीत मिली थी. मतदान करने वालों में युवाओं और महिलाओं की संख्या अधिक थी.

लेकिन 2005 के अंतिम दौर के चुनाव में केवल 60 फ़ीसदी लोगों ने ही मतदान किया. इस चुनाव में कट्टरपंथी नेता मोहम्मद अहमदीनेजाद सत्ता में आए थे.

राष्ट्रपति

ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल के कार्यकाल के लिए होता है. कोई भी राष्ट्रपति लगातार दो बार से अधिक इस पद पर नहीं रह सकता है.

संविधान के मुताबिक़ राष्ट्रपति देश का दूसरा सबसे बड़ा अधिकारी होता है. वह कार्यपालिका का प्रमुख होता है और संविधान का पालन सुनिश्चित कराना उसकी ज़िम्मेदारी होती है.

लेकिन व्यावहारिक रूप में ईरान में राष्ट्रपति की शक्तियाँ मौलवियों, रूढ़िवादियों और देश के सर्वोच्च नेता ने सीमित कर दिए हैं. देश की सेनाओं पर राष्ट्रपति का नहीं बल्कि सर्वोच्च नेता का नियंत्रण होता है, वह सुरक्षा, रक्षा और विदेश मामलों के मुद्दों पर फ़ैसले लेते हैं.

ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव चार साल के कार्यकाल के लिए किया जाता है

राष्ट्रपति पद के सभी उम्मीदवारों को उलेमा काउंसिल की मंजूरी मिलनी ज़रूरी होती है. काउंसिल ने 2005 में हुए चुनाव के सैकड़ों उम्मीदवारों पर प्रतिबंध लगा दिया था.

तेहरान के मेयर और कट्टरपंथी नेता महमूद अहमदीनेजाद 2005 के चुनाव में अकबर हाशमी रफ़संजानी को दूसरे दौर के मतदान में हराकर राष्ट्रपति बने थे.

अहमदीनेजाद 1981 के बाद से ईरान के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जो मौलवी नहीं हैं.

महमूद अहमदीनेजाद ने सुधारवादी नेता मोहम्मद ख़ातमी की जगह ली थी. ख़ातमी मई 1997 में हुए चुनाव में 70 फ़ीसदी से अधिक वोट पाकर राष्ट्रपति बने थे.

वह उलेमा काउंसिल के माध्यम से महत्वपूर्ण सुधार ला पाने में विफल रहे और उनकी यह विफलता तब और बढ़ गई जब 2004 में हुए संसद चुनाव में कट्टरपंथियों को बहुमत मिल गया.

मंत्रिमंडल

मंत्रिमंडल के सदस्यों का चुनाव राष्ट्रपति करते हैं लेकिन मंत्रिमंडल के सदस्यों के नाम का अनुमोदन संसद की ओर से होना ज़रूरी है.

संसद ने 2005 में अहमदीनेजाद की ओर से सुझाए गए चार नामों को मंज़ूरी नहीं दी थी. संसद मंत्रिमंडल के सदस्यों पर अभियोग भी लगा सकती है.

ईरान के सर्वोच्च नेता का रक्षा, सुरक्षा और विदेशी मामलों के फ़ैसलों में दखल होता है. इसलिए हर फ़ैसले पर उनके कार्यालय का दख़ल रहता है. राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति मंत्रिमंडल का प्रमुख होता है.

संसद

संसद या मजलिस के 290 सदस्यों का चुनाव लोकप्रिय वोटों के जरिए चार साल के लिए किया जाता है. संसद को क़ानून पारित करने का अधिकार होता है. वह राष्ट्रपति या मंत्रिमंडल के सदस्य को नोटिस देकर अभियोग भी लगा सकती है.

ईरान की संसद या मजलिस के संसद के 290 सदस्यों का चुनाव चार साल के लिए होता है

जबकि मज़लिस या संसद में पेश होने वाले सभी विधेयक का कट्टरपंथी उलेमा काउंसिल से अनुमोदन ज़रूरी होता है.

ईरान में 2000 में हुए चुनाव में पहली बार सुधारवादी नेता बहुमत में आए थे लेकिन 2004 के चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली. कई सुधारवादी नेताओं के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.

पूर्व परमाणु वार्ताकार अली लारीजानी संसद के निवर्तमान अध्यक्ष हैं.

विशेषज्ञ सभा

विशेषज्ञ सभा का प्रमुख काम सर्वोच्च नेता की नियुक्ति है, उनके कामकाज पर निगरानी और अगर वे अपने दायित्व का निर्वाह ठीक से नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें उनके पद से हटा देना है.

आमतौर पर विशेषज्ञ सभा की साल में दो बार बैठक होती है.

देश के सर्वोच्च नेता की नियुक्ति विशेषज्ञ सभा का मुख्य काम होता है

हालांकि विशेषज्ञ सभा का कार्यालय पवित्र शहर क़ॉम में है लेकिन इसकी बैठक तेहरान और मशहाद में भी होती है. विशेषज्ञ सभा में कुल 86 सदस्य होते हैं और उनका चुनाव आठ साल के लिए किया जाता है. इसका चुनाव 2014 में प्रस्तावित है.

केवल धर्मगुरु ही इस सभा का चुनाव लड़ सकते हैं और उनके नाम का अनुमोदन उलेमा काउंसिल करती है.

इस सभा में रूढ़िवादियों का प्रभुत्व है. पूर्व राष्ट्रपति अकबर हाशमी रफ़संजानी इस समय इस सभा के अध्यक्ष हैं. वे 2005 में वर्तमान राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से राष्ट्रपति का चुनाव हार गए थे.

उलेमा काउंसिल

उलेमा काउंसिल ईरान की सबसे अधिक ताक़तवर संस्था है. इस समय इस पर कट्टरपंथियों का क़ब्ज़ा है. इसके छह धर्म गुरुओं को सर्वोच्च नेता नियुक्त करते हैं और छह धर्मशास्त्रियों की नियुक्ति न्यायपालिका करती है जिनका अनुमोदन संसद करती है.

उलेमा काउंसिल ईरान की सबसे ताक़तवर संस्था है

इसके सदस्यों का चुनाव छह साल के लिए होता है और इसके आधे सदस्य हर तीन साल बाद बदल जाते हैं.

परिषद संसद की ओर से पारित सभी विधेयकों का अनुमोदन करती है. अगर उसे लगता है कि विधेयक संविधान और इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ नहीं है तो उसे रोकने का अधिकार भी परिषद के पास है.

उलेमा काउंसिल के पास किसी को संसद, राष्ट्रपति और विशेषज्ञ सभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का भी अधिकार है.

सर्वोच्च नेता

ईरान के संविधान में सर्वोच्च नेता की भूमिका दिवंगत आयतुल्ला ख़ुमैनी के विचारों पर आधारित है. सर्वोच्च नेता ईरान के राजनीतिक संरचना में सबसे अधिक अधिकार रखने वाला नेता होता है.

जुमे की नमाज़ पढ़ाने वाले मौलवियों की नियुक्ति भी सर्वोच्च नेता करते हैं

वह सरंक्षक परिषद के छह सदस्यों और न्यापालिका के प्रमुख, सेनाओं के कमांडर, टीवी और रेडियो सेवाओं के प्रमुख और जुमे की नमाज़ पढ़ाने वाले मौलवियों की नियुक्ति करते हैं.

इस समय अयातुल्ला अली ख़ामेनेई सर्वोच्च नेता हैं. वह राष्ट्रपति के चुनाव को भी मान्यता देते हैं.

न्यायपालिका प्रमुख

ईरान की न्यायपालिका कभी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं रही है. पिछले सदी के शुरुआत तक वह धर्मगुरुओं की ओर से नियंत्रित होती थी जो बाद में धर्मनिरपेक्ष भी हुई लेकिन क्रांति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पहले के सभी क़ानूनों को बदल दिया जो इस्लामिक नहीं थे. नए बनाए गए क़ानून शरिया पर आधारित थे.

ईरान की न्यायपालिका कभी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं रही है

न्यायपालिका इस्लामी क़ानून को लागू करना सुनिश्चित करती और क़ानूनों को परिभाषित करती है. यह उलेमा काउंसिल के छह सदस्यों की नियुक्ति भी करती है. इस समय अयातुल्ला महमूद हाशमी शाहरूदी है.

न्यायपालिका के प्रमुख की नियुक्ति सर्वोच्च नेता करते हैं और वह उन्हीं के प्रति जवाबदेह भी होते हैं.

सशस्त्र सेना

ईरान की सेना में रिवोल्युशनरी गार्ड और नियमित सेना शामिल है. दोनों सेनाएँ एक संयुक्त कमान के तहत काम करती हैं.

ईरान की सेना में रिवोल्युशनरी गार्ड और नियमित सेना शामिल है

रिवोल्यूशनरी गार्ड और नियमित सेना के सभी कमांडरों की नियुक्ति सर्वोच्च नेता करते हैं और कमांडर की जवाबदेही भी उन्हीं के प्रति होती है.

रिवोल्यूशनरी गार्ड की स्थापना 1979 में हुई क्रांति के बाद नए नेताओं और संस्थाओं की सुरक्षा और क्रांति के विरोधियों से लड़ने के लिए की गई थी.

रिवोल्यूशनरी गार्ड की अन्य संस्थाओं में भी दमदार मौजूदगी है.

निगरानी परिषद

निगरानी परिषद किसी क़ाननू पर संसद और उलेमा काउंसिल के बीच पैदा हुए मतभेद पर सुझाव देती है.

प्रमुख धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं और इनकी नियुक्ति सर्वोच्च नेता करते हैं.

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