जर्मनी में नहीं गिरी दिलों के बीच की दीवार

इसके साथ ही ये सवाल भी उठता है कि क्या दीवार गिरा दिए जाने के बाद जर्मनी वास्तव में एक हो पाया है. भूगोल पर बनाई दीवार तो मिटा दी गई लेकिन क्या इसके साथ ही समाज और विचार का विभाजन भी मिट गया या ये भेद अब भी कायम हैं.
ये सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इस साल बर्लिन की दीवार गिरा दिए जाने की 20वीं सालगिरह मनाई जा रही है. ये दीवार नवंबर 1989 में गिराई गई थी.
पश्चिम जर्मनी की राजधानी रहे बॉन शहर में 90 के दशक में पूर्वी जर्मनी से आए कुछ युवाओं से मैने इस बारे में बात की तो साफ़ फ़र्क समझ में आया.
इन्हें लगता है कि पूर्वी जर्मनी का होने के कारण उन्हें क़दम-क़दम पर परायापन महसूस कराया जाता रहा है.जर्मन भाषा की एक अध्यापिका जैसमीन कहती हैं, “एक तरह से हम यहां अवांछित हैं. नौकरी के लिए और अपनी जगह बनाने के लिए हमें अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है.”
पूर्व-पश्चिम का फ़र्क
एक तरह से हम यहां अवांछित हैं. नौकरी के लिए और अपनी जगह बनाने के लिए हमें अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है जैसमीन
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दूसरी तरफ़ पश्चिम जर्मनी में खास तौर पर प्रौढ़ लोग संपन्नता और श्रेष्ठता के भाव से भरे नज़र आते हैं. तकनीकी और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पश्चिम जर्मनी ने चमत्कारी प्रगति की थी लेकिन क़रीब दो दशकों से उसे पूर्वी इलाकों के साथ अपने संसाधन साझा करने पड़ रहे हैं.
पश्चिम जर्मनी के शहर कोलोन में तीन पीढ़ियों से कटलरी व्यवसायी 53 साल के क्रिशे इस बदलाव को आज तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं. “पूर्वी जर्मनी के लोग हमारी गाढ़ी मेहनत की मलाई खा रहे हैं और हमारी कीमत पर पूर्वी जर्मनी के विकास में मदद की जा रही है.”
बॉन विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ.हाइन्ज़ वेसलर कहते हैं, “सच्चाई दोनों के कहीं बीच है.पूर्वी जर्मनी पीछे तो है लेकिन ये भी सच है कि मौजूदा आर्थिक मंदी से भी वो कम प्रभावित है.तेज़ी से बूढ़ी होती वहां की आबादी एक समस्या है तो पश्चिम में भी ये समस्या उतनी ही सघन है.”
अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के पश्चिमी हिस्से पर अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस यानी मित्र देशों का क़ब्ज़ा हुआ और पूर्वी हिस्से पर सोवियत संघ ने अपना एक सैटेलाइट देश यानी पूर्वी जर्मनी खड़ा कर दिया.
विकास का असर
ऐतिहासिक ब्रैन्डनबुर्ग गेट आज़ादी और एकता की चाहत का प्रतीक माना जाता है
1961 में विभाजन को पक्का करने के लिए बर्लिन की दीवार भी खड़ी कर दी गई. दोनों देशो की सीमा पर ऐतिहासिक ब्रान्डनबुर्ग गेट बंद कर दिया गया लेकिन मिखाईल गोर्बाचेव के ग्लासनोस्त के दौर में 1989 में बर्लिन की दीवार गिरा दी गई.
जर्मन एकता की चाहत और आज़ादी के प्रतीक के तौर पर इस गेट को भी खोल दिया गया. उसके बाद दोनों जर्मनी फिर से एक हो गए.
इन बीस सालों में पूर्वी जर्मनी के विकास का मैराथन काम हुआ है लेकिन आंकड़ों पर नज़र डालें तो यहां आय और रोज़गार का स्तर पश्चिम के मुक़बले अब भी काफी कम है.
पूर्वी जर्मनी के लोग हमारी गाढ़ी मेहनत की मलाई खा रहे हैं और हमारी कीमत पर पूर्वी जर्मनी के विकास में मदद की जा रही है क्रिशे
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पूर्वी इलाके में ग़रीबी की दर पश्चिमी जर्मनी के मुक़ाबले छह प्रतिशत अधिक है और बेरोज़गारी की दर भी यहां पश्चिमी इलाकों से दोगुनी है.
आर्थिक असंतुलन तो एक सच्चाई है ही लेकिन ज्यादा बड़ी खाई वो है जो ज़ेहन में कायम है.
मशहूर जर्मन पत्रिका डेर श्पीगल के एक सर्वे के मुताबिक क़रीब दो दशक बीत जाने के बाद भी एकीकृत जर्मनी की स्वीकार्यता पूरी तरह नहीं बन पाई है.
'पश्चिम में रहना चाहते हैं'
एक हो गए जर्मनी के पूर्वी हिस्सों में रहने वाले लोगों का लोकतंत्र के प्रति संदेह बरकरार है.
उनका मानना है कि जर्मनी में कम्युनिस्ट शासन से लोगों का मोह भंग इसलिए हुआ क्योंकि उसे ठीक से लागू नहीं किया गया वरना समाजवाद एक बेहतर विचार है.
इसी तरह बीलेफेल्ड विश्वविद्यालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक पूर्वी जर्मनी के वासी महसूस करते हैं कि एकीकृत जर्मनी में उनकी हैसियत दोयम दर्जे की है.
वहीं पश्चिम के लोग मानते हैं कि वह एक बदतर और शर्मनाक इतिहास है. पेशेवर चित्रकार पीटर का कहना हैं, “मैं स्कूल के दिनों में बर्लिन गया था और तब की कम्युनिस्ट सरकार के प्रोपेगेंडा से रंगी दीवारें मेरे दिमाग में आज भी ताज़ा हैं.”
डॉ वेसलर कहते हैं, “हमारे सामने ये भेद ज़रूर हैं लेकिन हमारे बच्चों के लिए पूर्वी जर्मनी का एक अलग देश इतिहास भर है और वो पूरब के भी उतने ही निकट हैं जितने कि हमारे.”
संभवत: पूरी तरह से एक होनें में पीढ़ियां लगेंगी.
लेकिन उससे दिलचस्प ये है कि अगर आप ये पूछें कि फिर से कोई दीवार खिंचे तो आप कहां रहना चाहेंगे. जवाब मिलता है “पश्चिम जर्मनी में.”
ज़ाहिर है लोकतंत्र और उदारवाद की हवा उन्हें रास आ रही है लेकिन वो अपने अतीत का तिरस्कार भी नहीं करना चाहते.


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