प्रेमांधता में की गई हत्याओं के लिए फांसी नहीं : सर्वोच्च न्यायालय

अदालत ने अपने एक आदेश में कहा कि दोनों को फांसी पर लटकाने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी रखल के उकसावे में आकर प्रेमांध होकर हत्याओं को अंजाम दिया। इस कारण अपराध की गंभीरता कम हो जाती है।

न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा और न्यायमूर्ति बी.एस.चौहान की खंडपीठ ने कहा, "इस सच्चाई में कोई संदेह नहीं कि दोनों व्यक्तियों ने क्रूरतापूर्वक चार व्यक्तियों की हत्या उस समय कर दी जब वे सो रहे थे। लेकिन इस मामले की गंभीरता को कम करने वाली स्थितियां मौजूद हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

अदालत ने 28 मई को दिए और बाद में जारी किए अपने फैसले में कहा है, "दोनों व्यक्तियों का व्यवहार कुछ इस तरह से लिया जाएगा कि दोनों ने प्रेमांधता में आकर इस अपराध को अंजाम दिया और (दोनों की रखल) ने अपने परिवार द्वारा खुद के साथ की जा रही जिन ज्यादतियों के बारे में बताया, दोनों ने उसकी सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की।"

खंडपीठ ने कहा, "हालांकि आरोपियों का अपराध वीभत्स है जो कि मानव मतिष्क के पथभ्रष्ट होने का परिणाम है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि दोनों ने बहुत अमानवीय काम किया है, लेकिन हमारे विचार से इसके लिए उच्च न्यायालय द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त है।"

दरअसल, सरहिंद कस्बे के नगरायुक्त सेवा सिंह और उनके बेटे रछपाल सिंह उर्फ हैपी और स्थानीय गुरुद्वारे के दो सेवादारों इंदरजीत सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या कर दी गई थी।

गुरुद्वारे के ही दो पूर्व सेवादारों कमलजीत सिंह और मंजीत सिंह ने इन हत्याओं को अंजाम दिया था। इन दोनों का सेवा सिंह की पत्नी के साथ अवैध संबंध था।

एक स्थानीय अदालत ने इस मामले में दोनों आरोपी पूर्व सेवादारों को मृत्यदंड तथा महिला को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने दोनों की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया था। पंजाब सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी और दोनो अभियुक्तों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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