किन परिस्थितियों में हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार..

किन परिस्थितियों में हुआ ऑपरेशन ब्लूस्टार..

जहाँ इस कार्रवाई ने पंजाब समस्या को पूरे विश्व में चर्चित कर दिया वहीं इससे सिख समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं और अनेक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस कदम ने समस्या को और जटिल बना दिया.

उधर भारत सरकार और ऑपरेशन ब्लूस्टार के सैन्य कमांडर मेजर जनरल केएस बराड़ का कहना था कि उनकी जानकारी के मुताबिक कुछ ही दिनों में ख़ालिस्तान की घोषणा होना जा रही थी और उसे रोकने के लिए ऑपरेशन को जल्द से जल्द अंजाम देना ज़रूरी था.

लेकिन इस सैन्य कार्रवाई की पृष्ठभूमि क्या थी और किन परिस्थितियों में ये कार्रवाई हुई? एक नज़र डालते हैं उन घटनाओं पर जो इससे पहले घटीं:

पंजाब समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित माँगों को लेकर शुरु हुई थी. पहले वर्ष 1973 में और फिर 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया. मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों. अकाली ये भी चाहते थे कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में उन्हें स्वायत्तता मिले.

भिंडरांवाले को सितंबर 1981 में गिरफ़्तार किया गया और अक्तूबर में रिहा कर दिया गया

अकालियों की पंजाब संबंधित माँगें ज़ोर पकड़ने लगीं. अकालियों की माँगों में प्रमुख थीं - चंडीगढ़ केवल पंजाब की ही राजधानी हो, पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में शामिल किए जाएँ, नदियों के पानी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की राय ली जाए, 'नहरों के हेडवर्क्स' और पन-बिजली बनाने के मूलभूत ढाँचे का प्रबंधन पंजाब के पास हो. इसी के साथ कुछ अन्य मुद्दे थे - फ़ौज में भर्ती काबिलियत के आधार पर हो और इसमें सिखों की भर्ती पर लगी कथित सीमा हटाई जाए और अखिल भारतीय गुरुद्वारा क़ानून बनाया जाए.

अकाली-निरंकारी झड़प

अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को हिंसक झड़प हुई. इसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए और रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. अनेक पर्यवेक्षक इस घटना को पंजाब में चरमपंथ की शुरुआत के तौर पर देखते हैं.

ये आरोप लगाया जाता है कि सिख समुदाय में अकाली दल के जनाधार को घटाने के लिए काँग्रेस ने सिख प्रचारक जरनैल सिंह भिंडरांवाले को परोक्ष रूप से प्रोत्साहन दिया. मकसद ये था कि अकालियों के सामने सिखों की माँगें उठाने वाले ऐसे किसी संगठन या व्यक्ति को खड़ा किया जाए जो अकालियों को मिलने वाले समर्थन में सेंध लगा सके. लेकिन इस दावे को लेकर ख़ासा विवाद है.

सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर के आसपास घेराबंदी कर मोर्चा बना लिए थे

अकाली दल भारत की राजनीतिक मुख्यधारा में रहकर पंजाब और सिखों की माँगों की बात कर रहा था लेकिन उसका रवैया ढुलमुल माना जाता था. उधर इन्हीं मुद्दों पर जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए केंद्र सरकार को दोषी ठहराना शुरु किया. वे विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों और धर्म और उसकी मर्यादा पर नियमित तौर पर भाषण देने लगे. जहाँ बहुत से लोग उनके भाषणों को भड़काऊ मानते थे वहीं अन्य लोगों का कहना था कि वे सिखों की जायज़ मागों और धार्मिक मसलों की बात कर रहे हैं.

पंजाब में हिंसा का दौर

धीरे-धीरे पंजाब में हिंसक घटनाएँ बढ़ने लगीं. सितंबर 1981 में हिंद समाचार - पंजाब केसरी अख़बार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हुई. जालंधर, तरन तारन, अमृतसर, फ़रीदकोट और गुरदासपुर में हिंसक घटनाएँ हुईं और कई लोगों की जान गई.

भिंडरांवाले के ख़िलाफ़ लगातार हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगने लगे लेकिन पुलिस का कहना था कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के पर्याप्त सबूत नहीं हैं.

सितंबर 1981 में ही भिंडरांवाले ने महता चौक गुरुद्वारे के सामने गिरफ़्तारी दी लेकिन वहाँ एकत्र भीड़ और पुलिस के बीच गोलीबारी हुई और ग्यारह व्यक्तियों की मौत हो गई. पंजाब में हिसा का दौर शुरु हो गया. कुछ ही दिन बाद सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के सदस्यों ने एयर इंडिया के विमान का अपहरण भी किया.

लोगों को भिंडरांवाले के साथ जुड़ता देख अकाली दल के नेताओं ने भी भिंडरावाले के समर्थन में बयान देने शुरु कर दिए. वर्ष 1982 में भिंडरांवाले चौक महता गुरुद्वारा छोड़ पहले स्वर्ण मंदिर परिसर में गुरु नानक निवास और इसके कुछ महीने बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त से अपने विचार व्यक्त करने लगे.

अकाली दल ने सतलुज-यमुना लिंक नहर बनाने के ख़िलाफ़ जुलाई 1982 में अपना 'नहर रोको मोर्चा' छेड़ रखा था जिसके तहत अकाली कार्यकर्ता लगातार गिरफ़्तारियाँ दे रहे थे. लेकिन स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरांवाले ने अपने साथी ऑल इंडिया सिख स्टूडेंट्स फ़ैडरेशन के प्रमुख अमरीक सिंह की रिहाई को लेकर नया मोर्चा या अभियान शुरु किया. अकालियों ने अपने मोर्चे का भिंडरांवाले के मोर्चे में विलय कर दिया और धर्म युद्ध मोर्चे के तहत गिरफ़्तारियाँ देने लगे.

एक हिंसक घटना में पटियाला के पुलिस उपमहानिरीक्षक के दफ़्तर में भी बम विस्फोट हुआ. पंजाब के उस समय के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पर भी हमला हुआ.

डीआईजी अटवाल की हत्या

फिर अप्रैल 1983 में एक अभूतपूर्व घटना घटी. पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दहाड़े हरिमंदिर साहब परिसर में गोलियाँ मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस का मनोबल लगातार गिरता चला गया.

अटवाल की हत्या की जाँच में गिल ने पाया कि घटनास्थल के पास उस समय सौ सुरक्षाकर्मी थे

कुछ ही महीने बाद जब पंजाब रोडवेज़ की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने जालंधर के पास पहली बार कई हिंदुओं को मार डाला तो इंदिरा गाँधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की काँग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया.

राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया. पंजाब में स्थिति बिगड़ती चली गई और 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार से तीन महीने पहले हिंसक घटनाओं में मरने वालों की संख्या 298 थी.

अकाली राजनीति के जानकारो के अनुसार ऑपरेशन ब्लूस्टार से पहले इंदिरा गाँधी सरकार की अकाली नेताओं के साथ तीन बार बातचीत हुई. आख़िरी चरण की बातचीत फ़रवरी 1984 में तब टूट गई जब हरियाणा में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई. एक जून को भी स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात केंद्र रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स के बीच गोलीबारी हुई लेकिन तब तक वहाँ ये आम बात बन गई थी.

कार्रवाई और सिखों में रोष

स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फ़ेडरेशन के लड़ाकों ने चारों तरफ़ ख़ासी मोर्चाबंदी कर रखी थी.

दो जून को परिसर में हज़ारों श्रद्धालुओं ने आना शुरु कर दिया था क्योंकि तीन जून को गुरु अरजन देव का शहीदी दिवस था.

उधर जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश को संबोधित किया तो ये स्पष्ट था कि सरकार स्थिति को ख़ासी गंभीरता से देख रही है और भारत सरकार कोई भी कार्रवाई कर सकती है.

पंजाब से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों और बस सेवाओं पर रोक लग गई, फ़ोन कनेक्शन काट दिए गए और विदेशी मीडिया को राज्य से बाहर कर दिया गया. लेकिन सेना और सिख लड़ाकों के बीच असली भिड़ंत पाँज जून की रात को ही शुरु हुई.

तीन जून तक भारतीय सेना अमृतसर में प्रवेश कर और स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर चुकी थी और शाम में कर्फ़्यू लगा दिया गया था. चार जून को सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ताकि चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाज़ा लगाया जा सके.

सैन्य कमांडर केएस बराड़ ने माना कि चरमपंथियों की ओर से इतना तीखा जवाब मिला कि पाँच जून को बख़तरबंद गाड़ियों और टैंकों को इस्तेमाल करने का निर्णय किया गया. उनका ये भी कहना था कि सरकार चिंतित थी कि यदि स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी ज़्यादा लंबी चलती है तो तरह-तरह की अफ़वाहों को हवा मिलेगी और भावनाएँ भड़केंगी.

भीषण ख़ून-ख़राबा हुआ और सदियों के अकाल तख़्त पूरी तरह तबाह हो गया, स्वर्ण मंदिर पर भी गोलियाँ चलीं कई सदियों में पहली बार वहाँ से पाठ छह, सात और आठ जून को नहीं हो पाया. ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिख पुस्तकालय जल गया.

भारत सरकार के श्वेतपत्र के अनुसार 83 सैनिक मारे गए और 249 घायल हुए. इसी श्वेतपत्र के अनुसार 493 चरमपंथी या आम नागरिक मारे गए, 86 घायल हुए और 1592 को गिरफ़्तार किया गया. लेकिन इन सब आँकड़ों को लेकर अब तक विवाद चल रहा है. सिख संगठनों का कहना है कि हज़ारों श्रद्धालु स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद थे और मरने वाले निर्दोष लोगों की संख्या भी हज़ारों में है. इसका भारत सरकार खंडन करती आई है.

इस कार्रवाई से सिख समुदाय की भावनाओं को बहुत ठेस पहुँची. कई प्रमुख सिख बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाए कि स्थिति को इतना ख़राब क्यों होने दिया गया कि ऐसी कार्रवाई करने की ज़रूरत पड़ी? कई प्रमुख सिखों ने या तो अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया या फिर सरकार द्वारा दिए गए सम्मान लौटा दिए.

सिखों और काँग्रेस पार्टी के बीच दरार पैदा हो गई जो उस समय और गहरा गई जब दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने कुछ ही महीने बाद 31 अक्तूबर को तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी. इसके बाद भड़के सिख विरोधी दंगों से काँग्रेस और सिखों की बीच की खाई और बड़ी हो गई.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+