हबीब तनवीर नाम एक, आयाम अनेक
छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक सितंबर 1923 को जन्मे हबीब तनवीर ने होश संभालते ही आम आदमी की आवाज को बुलन्द करने का बीड़ा उठा लिया था। रायपुर, नागपुर और अलीगढ़ से शिक्षा हासिल करने के बाद वह 1945 में आकाशवाणी से जुड़ गए। उन्होंने वर्ष 1946 में 'फिल्म इंडिया' नाम की एक पत्रिका में अपनी कलम का जौहर भी दिखाया। वर्ष 1945 से 1952 के दरम्यान उन्होंने नौ फीचर फिल्मों में काम किया। वह वर्ष 1956 में 'ब्रिटिश ड्रामा बोर्ड' लंदन से जुड़ गए। वर्ष 1959 में उन्होंने अपनी मित्र मोनिका मिश्रा के साथ 'नया थिएटर' की नींव रखी।
हबीब तनवीर ने 1960 में मोनिका मिश्रा से ब्याह रचा लिया। हबीब तनवीर ने 'इन्स्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एज्यूकेशन' न्यूयार्क के सौजन्य से अमेरिका के रंगमंच को जानने के लिए एक साल वहां का दौरा किया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1964 में टेलीविजन केन्द्र दिल्ली में कार्यक्रम निर्माता के तौर पर काम शुरू किया।
हबीब तनवीर ने रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी कला को नई पहचान दिलाई। उनके लिए माटी की सौंधी महक ही जीवन का सच रही। उन्होंने अपने छह दशक के रंगमंच काल में व्यवस्था पर चोट करने में कभी भी हिचक नहीं दिखाई। उनके नाटक 'चरणदास चोर' हो या 'आगरा बाजार' अथवा 'जमादारिन' या 'पोंगा पंडित' सभी में व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई है। यही कारण रहा है कि उन्हें कई बार विपरीत हालात का सामना करना पड़ा।
तमाम पत्र पत्रिकाओं में नाटक समीक्षक के तौर पर भी हबीब तनवीर की पहचान बनी। उन्होंने पद्म भूषण और पद्मश्री सहित दर्जनों सम्मान मिले। हबीब तनवीर से वषों से जुडे अनूप रंजन कहते हैं, " वे एक व्यक्ति नहीं बल्कि संस्था और आंदोलन थे, जो आम आदमी की आवाज को अपनी आवाज बनाकर रंगमंच के जरिए दुनिया के सामने लाए।"
पत्रकार भारत शर्मा तो उन्हें आधुनिक कबीर कहने से भी नहीं हिचकते। उनका कहना है "हबीब तनवीर ने रूढ़ियों और व्यवस्थाओं पर हमले किए, जिसके चलते उनपर भी लोगों ने निशाने साधे, मगर वे डिगे नहीं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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