मौसम के बदलाव की मार बिहार में लीची के उत्पादन पर भी

बिहार में करीब 28 हजार हेक्टेयर भूमि पर लीची के बागान हैं जहां प्रतिवर्ष औसतन तीन लाख टन लीची का उत्पादन होता है। बिहार में आमतौर पर शाही एवं चायना लीची का उत्पादन होता है।

लीची के बगान मुख्य रूप से मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, वैशाली, भागलपुर, कटिहार, बेगूसराय तथा पूर्णिया जिले में है। इसमें सबसे अधिक लीची के बागान मुजफ्फरपुर जिले में है, जहां करीब 10 हजार हेक्टेयर भूमि में लीची के बगान हैं। इस वर्ष मौसम के बदले मिजाज के कारण लीची के कम उत्पादन की आशंका व्यक्त की जा रही है।

लीची के किसान लालधारी साह का कहना है कि इस वर्ष लीची के पेड़ में मंजर ही कम आए और जो आए भी वह तेज हवा में झड़ गए इस कारण लीची बहुत कम मात्रा में पेड़ में आया।

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र के मुजफ्फरपुर इकाई के वैज्ञानिक डाक्टर राजेश कुमार का मानना है कि मौसम के बदलाव के कारण ये सभी समस्याएं आ रही हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष अप्रैल महीने में ही तेज धूप होने और बारिश नहीं होने के कारण लीची के उत्पादन में कमी देखी जा रही है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कम उत्पादन के लिए लीची उत्पादकों का उचित प्रबंधन नहीं होना भी एक कारण है।

उनका मानना है कि अगर लीची उत्पादकों द्वारा उचित प्रबंधन किया जाए तो बिहार में जितने क्षेत्रफल में लीची के बगान है उसमें प्रतिवर्ष चार लाख टन से ज्यादा लीची का उत्पादन किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि शाही लीची में लाली आने का सही समय जहां 15 मई से प्रारंभ होता है वहीं चायना लीची में लाली आने का सही समय 12 जून से शुरू होता है। परंतु इस वर्ष अप्रैल माह में तेज धूप के कारण बिना फल तैयार हुए ही लाली आने लगी है, जिसके कारण उत्पादकों को लीची समय के पूर्व ही तोड़ना पड़ रही है।

उन्होंने बताया कि बिहार में पिछले वर्ष दो लाख 70 हजार टन ही लीची की पैदावार हुई थी, परंतु इस वर्ष इसमें और कमी होने की आशंका है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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