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भिंडरांवाले का व्यक्तित्व और सोच

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भिंडरांवाले का व्यक्तित्व और सोच

एक समय पंजाब को ब्रितानी-भारतीय सेना में भर्ती के लिए सबसे उपजाऊ ज़मीन माना जाता था. यह एक अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि जिस व्यक्ति को 1980 के दशक में सिख चरमपंथ का जन्मदाता माना जाता है, उनके माता-पिता ने उनका नाम जरनैल सिंह रखा था.

संत जरनैल सिंह के नाम के साथ भिंडरांवाले तब जुड़ा जब वो अपेक्षाकृत कम उम्र में सिख धर्म और ग्रंथों के बारे में शिक्षा देने वाली संस्था- दमदमी टक्साल के अध्यक्ष चुने गए.

इस देहाती नौजवान को औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी. उनके रहस्यपूर्ण लेकिन असाधारण तरीके से प्रमुखता में आना पंजाब में 'मुक्ति' की सबसे भीषण लड़ाई के बारे में काफ़ी कुछ बताती है. और इस लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिख सुमदाय से जोड़कर भी देखा जाता है.

संत जरनैल सिंह ने कभी ख़ालिस्तान के गठन की माँग नहीं की थी. उन्होंने वर्ष 1973 में आंनदपुर साहिब में अकाली दल के ज़रिए पास किए गए आनंदपुर साहिब के प्रस्तावों की बात की थी. लेकिन ये प्रस्ताव स्वायत्ता की बात करते हैं, अलग राष्ट्र की नहीं वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह

संत जरनैल सिंह ने कभी ख़ालिस्तान के गठन की माँग नहीं की थी. उन्होंने वर्ष 1973 में आंनदपुर साहिब में अकाली दल के ज़रिए पास किए गए आनंदपुर साहिब के प्रस्तावों की बात की थी. लेकिन ये प्रस्ताव स्वायत्ता की बात करते हैं, अलग राष्ट्र की नहीं

ये आंदोलन भारतीय सरकार की ताक़त से लड़ने में नाकाम रहा. हालाँकि संत भिंडरवाले का व्यक्तित्व और सोच अभी भी ज़िंदा है.

भिंडरावाले और भगत सिंह

पिछले कुछ वर्षो में इस इलाक़े में जिन दो नेताओं की तस्वीरें सबसे अधिक बिकीं हैं वो हैं शहीद भगत सिंह और संत भिंडरावाले.

इसमें कोई शक नहीं कि इन दोनों नेताओं की तुलना नहीं हो सकती. जहाँ शहीद भगत सिंह की पहचान एक विचारक के रुप में होती है वहीं भिंडरावाले का जुड़ाव 'गन कल्चर' या बंदूक की संस्कृति से है.

इसके अलाव एक और दूसरा बड़ा फ़र्क है. शहीद भगत सिंह कम से कम दक्षिण एशिया में सब के लिए सम्मानित हैं जबकि संत भिंडरावाले की पहचान एक विशेष समुदाय के नेता के रुप में है. ऐसे में जितने लोग उनसे प्रेम करने वाले या उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले हैं, शायद उतने या फिर उससे भी अधिक उनकी गिनती है जो उनसे नफ़रत करते हैं.

एक व्यक्ति हीरो है या आतकंवादी है, ये एक सापेक्ष चीज़ है.

उस समय कोई इस बात की कल्पना नहीं कर सकता था कि 30 वर्ष की आयु में जिस भिंडरावाले ने दमदमी टकसाल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया, अगले कुछ महीनों में ऐसी नई परिकल्पना को हवा देगा कि इस सीमाँत प्रांत में अप्रत्याशित उथल-पुथल पैदा हो जाएगी.

दमदमी टक्साल के प्रमुख की नियुक्ती के समय भिंडरावाले के साथ टोहड़ा और बादल

फिर ये उथल-पुथल एक दशक से अधिक तक चली जिस दौरान निर्दोष लोगों समेत हज़ारों की जान चली गई.

विडंबना ये है कि ऐसै समय जब भारत एक बार फिर चरमपंथ के ख़तरे से दो-चार है, ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब की घटना को लगभग भुला ही दिया गया है.

इस परिस्थिति में पंजाब में चरमपंथ का स्रोत माने जाने वाले संत भिंडरावाले की इस मामले में पूरी भूमिका का सही ढंग से विश्लेषण करने की आवश्यकता है.

वर्ष 1977 में उनके उनके दमदमी टक्साल का प्रमुख नियुक्त किए जाने के साक्षी, उस समय के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सिखों की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा थे, जो अपनी शुभकामनाएँ देने वहीं मौजूद थे.

दमदमी टक्साल और निरंकारी

संत भिंडरावाले की नियुक्ती के तुरंत बाद उस इलाक़े में राजनीतिक विमर्श बदलने लगी. जिस समय भिंडरावाले ने दमदमी टक्साल के अध्यक्ष का पद ग्रहण किया था, उस समय दमदमी टक्साल का सीधा टकराव निरंकारियों से हो चुका था.

प्रदर्शनकारी दमदमी टक्साल और अखंड कीरतनी जत्था से संबंधित थे. वर्ष 1978 की ख़ूनी वैशाखी की घटना के बाद पंजाब जैसे हमेशा के लिए बदल गया, दोबारा पहले जैसा कभी नहीं हो पाया.

कुछ दिनों के अंदर संत भिंडरावाले ने नया रास्ता अपनाया. जैसाकि इस घटना से स्पष्ट हुआ - न्याय व्यवस्था चौपट हो चुकी थी और बदले की भावना आकार ले रही थी.

तेरह अप्रैल 1978 को अमृतसर में सिखों और निरंकारियों के बीच झड़प में 13 अकाली मारे गए थे. वर्ष 1978 की ख़ूनी वैशाखी की घटना के बाद पंजाब जैसे हमेशा के लिए बदल गया, दोबारा पहले जैसा कभी नहीं हो पाया. वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह

तेरह अप्रैल 1978 को अमृतसर में सिखों और निरंकारियों के बीच झड़प में 13 अकाली मारे गए थे. वर्ष 1978 की ख़ूनी वैशाखी की घटना के बाद पंजाब जैसे हमेशा के लिए बदल गया, दोबारा पहले जैसा कभी नहीं हो पाया.

पत्रकार होने के नाते उनसे अनेक बार औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत करने से ऐसा प्रतीत हुआ कि उसी समय भिंडरावाले ने मन बना लिया कि वो अपने पंथ के लिए सर्वोच्च बलिदान यानी जीवन का बलिदान देंगे. ये उन्हें परंपरागत आकाली नेतृत्व से पूरी तरह अलग करता था.

'कभी ख़ालिस्तान की माँग नहीं की'

बाद में हालात भारत के ख़िलाफ़ संघर्ष में बदल गए, चाहे इन हालात का मक़सद ऑपरेशन ब्लूस्टार से पहले तक अस्पष्ट था. लेकिन ये तो स्पष्ट है कि संत जरनैल सिंह ने कभी ख़ालिस्तान के गठन की माँग नहीं की थी.

यह सही है कि उन्होंने वर्ष 1973 में आंनदपुर साहिब में अकाली दल के ज़रिए पास किए गए आनंदपुर साहिब के प्रस्तावों की बात की थी. लेकिन ये प्रस्ताव स्वायत्ता की बात करते हैं, अलग राष्ट्र की नहीं.

भिंडरावाले की पहचान तब और बढ़ी जब निरंकारी संप्रदाय के अध्यक्ष गुरुबचन सिंह और फिर बाद में हिंद समाचार- पंजाब केसरी अख़बार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हुई. लाला जगत नारायण निरंकारी संत का समर्थन करते थे.

जब संत भिंडरावाले दमदमी टक्साल से स्वर्ण मंदिर परिसर में पहुँच गए आए तो उनके पास लोगों का तांता लगने लगा. इसके बाद भिंडरावाले तब तक स्वर्ण मंदिर से नहीं निकले जब तक उनका हिंसात्म अंत नहीं हो गया.

उनको मानने वाले सिख समुदाय के लोग समाज में विभिन्न पदों और क्षेत्रों में सक्रिय थे. इनमें सेना के रिटायर्ड जनरल, नौकरशाह, शिक्षाविद और आम लोग शामिल थे. जिस चीज़ ने उन्हें करिश्माई बनाया वह थी सिख समुदाय से सीधी बात और सिखों में उनकी विश्ववशनीयता.

उनकी ज़िंदगी मितव्ययी थी और वो दोहरेपन में विश्वास नहीं करते थे. वो ऑपरेशन के समय अकाल तख़्त से भाग सकते थे लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. उनका व्यक्तित्व इससे और भी शत्तिशाली होकर निकला.

पैसा भ्रष्ट न बना पाया

इस लेखक ने उनसे 26 मई 1984 को मुलाक़ात की थी जब माना जाता है कि ऑपरेशन के लिए सेना को हरी झंडी दी जा चुकी थी. वो एक घंटे से अधिक आमने-सामने की मुलाक़ात थी. वो जानते थे कि क्या होने वाला है और हालात से वाक़िफ़ थे.

ये तो है ही कि वो मसले का सम्मानजनक हल निकालने के ख़िलाफ़ नहीं थे. उनके सहयोगी बग़ल वाले कमरे में बंदूक़ की सफ़ाई कर रहे थे.

पैसा और सत्ता उन्हें भ्रष्ट नहीं बना सका और यही बात एसजीपीसी अध्यक्ष गुरुचरण सिंह टोहड़ा के बारे में कही जा सकती है जिन्होंने उन्हे कई कठिन मौक़ो पर नैतिक समर्थन दिया था, चाहे वे उनके रास्ते से सहमत नहीं थे. सिख समुदाय के बीच उन्हें ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादा स्वीकार्यता मिली.

उनकी मिथ्या की शुरूआत वर्ष 1981 में हुई जब वे मुंबई में पुलिस को धोखा देकर अमृतसर में मेहता चौक पर स्थित अपने मुख्यालय पहुँचे.

दमदमी टक्साल उनके इसी मिथ्या को आधार बनाकर ऑपरेशन ब्लूस्टार के दो दशक तक उनके ज़िंदा होने की बात का प्रचार कर रहा.

वर्ष 1981 में लेखक ने संत भिंडरावाले का इंटरव्यू किया था जिसे एक भारतीय अंग्रेज़ी अख़बार ने इस शीर्षक से छापा था - 'शहादत की तलाश में....'. उस समय उनके सिख समाज में सक्रिय होने और प्रमुखता में आने का वो पहला साक्षात्कार था. उन्होंने जिस रास्ते को चुना, वो उन्हें उस अंत तक ले गया जिसे उनकी शायद बहुत पहले से तलाश थी.

(जगतार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने पंजाब से इंडियन एक्सप्रेस के लिए लगभग 25 साल रिपोर्टिंग की. पिछले 30 साल की पंजाब की राजनीति और सिख समस्या पर उन्होंने किताब जल्द ही प्रकाशित होने वाली है.)

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