जलवायु परिवर्तन से निपटने में अपनी हिस्सेदारी नहीं निभा रहे औद्योगिक देश : भारत
नई दिल्ली, 7 जून (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन संबंधी वार्ताओं में भारत के प्रधान वार्ताकार श्याम सरन ने कहा है कि औद्योगिक देश जलवायु परिवर्तन से निपटने में अपनी वैध जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि औद्योगिक देश यह कहकर माहौल को खराब करने का प्रयास कर रहे हैं कि विकासशील देशों के योगदान के बिना इस वैश्विक समस्या से निपटा नहीं जा सकता।
जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत सरन ने कहा कि दिसम्बर में कोपेनहेगेन में होने वाले जलवायु परिवर्तन संबंधी समझौते की तैयारी के लिए बान में आयोजित (1-12 जून तक) तैयारी वार्ता में पेश दस्तावेज में कुछ प्रावधान बाली में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) द्वारा तैयार कार्य योजना के अनुरूप नहीं हैं। ऐसे प्रावधानों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
सरन ने आईएएनएस को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा कि वर्तमान कसरत यूएनएफसीसीसी पर फिर से चर्चा करने के लिए नहीं वरन जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावी ढंग से निपटने के लिए इसे आगे बढ़ाने के लिए है।
सरन अगले सप्ताह बान में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। उन्होंने आशा जताई कि बान सम्मेलन के बाद तैयार दस्तावेज पहले से कहीं अधिक संतुलित होगा।
वर्ष 1997 के क्योटो प्रोटोकाल पर चर्चा करते हुए सरन ने कहा कि इसके अनुसार अमेरिका सहित सभी बड़े औद्योगिक देशों को 1990 की तुलना में वर्ष 2008-12 तक अपनी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में पांच प्रतिशत की कमी करनी थी लेकिन अधिकांश देश इसमें विफल रहे हैं।
सरन ने कहा कि इसी कारण वे माहौल को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। अभी हाल ही में जापान ने कहा कि आधार वर्ष 1990 के स्थान पर वर्तमान तिथि को बनाया जाना चाहिए।
बान ने कहा कि यह केवल भारत का नहीं वरन सभी विकासशील देशों का रुख है, जो जी-77 प्लस चीन के झंडे तले चर्चा में हिस्सेदारी कर रहे हैं। जी-77 कहे जाने वाले संगठन में वास्तव में 130 देश शामिल हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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