स्वात के नाइयों को फिर मिला काम

ये लोग पेशे से नाई हैं जिन्होंने तालेबान की धमकियों के बाद स्वात में लोगों की दाढ़ियाँ बनाना बंद कर दिया था. नतीज ये हुआ कि उनका रोज़गार छिन गया.
मालाकंड अपर के इलाक़े रंगमला में विस्थापितों के लिए बनाए गए राहत शिविर में आम लोगों के साथ कुछ नाइयों ने भी पनाह ले रखी है. इन्हें घर से दूरी का दर्द है लेकिन इस बात की ख़ुशी हैं कि यहाँ उन्हें अपना काम आज़ादी के साथ करने का अवसर मिला है.
शिविर में पनाह लेने वाले एक नाई शौकत अली का कहना है कि उन्होंने पिछले इतवार को अपना काम शुरू किया और आठ महीने के बाद तीन लोगों की दाढ़ी बनाई.
ग़ैर इस्लामी
स्वात में तालेबान की दाढ़ी बनाने पर पाबंदी से पहले मैं 15 से 20 दाढ़ी रोज़ाना बनाता था लेकिन अचानक पाबंदी के बाद मेरा काम काफ़ी प्रभावित हुआ. जबकि कैंप में रोज़ाना सिर्फ़ शेव से 50 से 100 रुपए कमा लेता हूँ फ़रमान अली, नाई
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उन्होंने बताया कि स्वात के मिंगोरा शहर में सौ से अधिक नाई की दुकानें थीं जिन्हें तालेबान की ओर से चेतावनी मिली थी कि किसी की दाढ़ी बनाना ग़ैर-इस्लामी है और अगर आने वाले ग्राहकों की दाढ़ी बनाई तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.
इसके बाद डर से नाइयों ने अपनी दुकानें बंद कर दी थीं और उनका काम सिर्फ़ बाल काटने तक सीमित रह गया था इसलिए रोज़गार कम हो गया था.
उन्होंने कहा कि उन्हें आठ महीने बाद शेव करने पर ख़ुशी हो रही है क्योंकि इस मुश्किल समय में कुछ न कुछ आमदनी हो रही है.
एक दूसरे नाई फ़रमान अली शिविर से बाहर खुले आसमान में भी काम करके ख़ुश हैं.
फ़रमान कहते हैं, "स्वात में तालेबान की दाढ़ी बनाने पर पाबंदी से पहले मैं 15 से 20 दाढ़ी रोज़ाना बनाता था लेकिन अचानक पाबंदी के बाद मेरा काम काफ़ी प्रभावित हुआ. कैंप में रोज़ाना सिर्फ़ दाढ़ी बनाने से 50 से 100 रुपये कमा लेता हूँ."
उन्होंने बताया कि स्वात में तमाम हेयर ड्रेसर पलायन कर चुके हैं और वो विभिन्न कैंपों में आज़ादी के साथ काम कर रहे हैं.
फ़रमान कहते हैं कि शिविर में काफ़ी दिनों के बाद बेरोकटोक काम मिलने से ख़ुशी है लेकिन उन्हें उस दिन का इंतज़ार है जब वो वापस जाकर अपने शहर में बिना ख़ौफ़ से अपना काम कर सकेंगे.
शिविर में एक साल बाद नाई से अपनी दाढ़ी बनवा रहे अकबर शाह ने बताया, "तालेबान के डर से कोई नाई दाढ़ी नहीं बना रहा था जबकि घर पर दाढ़ी बनाने में मुश्किल होती थी. नाई से दाढ़ी बनवा कर अच्छा लग रहा है."
ग़ौरतलब है कि तालेबान ने लड़कियों के स्कूल जाने, संगीत सुनने और साथ दाढ़ी बनवाने पर पाबंदी लगा रखी थी.
टीकाकारों की राय में हाल के दिनों में होने वाला फ़ौजी ऑपरेशन उस समय तक कामयाब नहीं होगा, जब तक लोग अपने इलाक़ों में वापस जाकर पूरी तरह से आज़ादी और बिना डर के अपना रोज़गार शुरू कर सकें.


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