मकोका मामलों में पुलिस की मंजूरी जरूरी: सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि 'महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट' (मकोका) के कठोर कानून के तहत गठित न्यायालयों में मामलों की सुनवाई किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अनुमति के बगैर शुरू नहीं की जा सकती।
इस निर्णय के बाद मकोका न्यायालय न केवल गलतियां करने वाले पुलिस अधिकारियों बल्कि अपराधियों के खिलाफ सुनवाई के लिए भी पूरी तरह पुलिस अधिकारी की अनुमति के अधीन हो जाएंगे।
न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और न्यायमूर्ति साइरिअक जोसेफ की पीठ ने एक निर्णय में संगठित अपराधाों के खिलाफ सुनवाई के लिए गठित विशेष मकोका अदालतों पर इन प्रतिबंधों को लगाए जाने को स्वीकृति प्रदान की।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला उन मामलों में सुनाया जिनमें मुंबई पुलिस की भ्रष्टाचार निवारण शाखा के कुछ अधिकारियों और कुछ अन्य व्यक्तियों पर संगठित अपराध में शामिल होने के आरोप में मामला चलाने के मकोका अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी।
पीठ ने कहा कि पुलिस अथवा किसी अन्य पक्ष द्वारा की गई शिकायत की सुनवाई के लिए पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के अधिकारी की मंजूरी आवश्यक होगी। न्यायालय ने कहा कि इससे इस कठोर कानून के दुरुपयोग की आशंका कम होगी।
मकोका के तहत पुलिस हिरासत के दौरान किसी आरोपी द्वारा की गई स्वीकारोक्तियों को न्यायालय में प्रमाण के तौर पर पेश किया जा सकता है आमतौर पर आपराधिक मामलों व अन्य कानूनों में ऐसा नहीं होता। इसके अतिरिक्त मकोका में आरोपी छह महीने तक जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता जबकि आम मामलों में यह अवधि तीन महीने की है।
पीठ ने कहा कि पुलिस अधिकारियों पर उनके द्वारा कथित रूप से किए गए अपराधों के लिए मकोका के तहत तब तक मामला नहीं चलाया जा सकता जब तक कि राज्य पुलिस का अतिरिक्त महानिदेशक इस की अनुमति न दे दे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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