मायावती को झटके, एक्सप्रेस-वे पर रोक

मायावती को झटके, एक्सप्रेस-वे पर रोक

इस योजना के मुताबिक दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा जैसे राज्य के प्रमुख औद्योगिक केंद्र से पूर्वांचल के बलिया ज़िले तक आठ लेन के एक्सप्रेस-वे निर्माण होना था.

ये टॉल टैक्स एक्सप्रेस-वे गंगा नदी के किनारे-किनारे बनना है और इसके संग-संग औद्योगिक केंद्रों और व्यावसायिक परिसरों को विकसित करने की भी योजना है.

शुक्रवार को अदालत ने पर्यावरण के मुद्दे को आधार बनाते हुए इस परियोजना पर रोक लगा दी है. अदालत ने आदेश दिया है कि राज्य सरकार को इस परियोजना के शुरू करने से पहले हर हाल में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी.

अदालत का कहना था, "इस परियोजना को लागू करने में पर्यावरण अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन हुआ है."

उधर हाईकोर्ट ने मायावती को एक ओर झटका दिया है. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लखनऊ जेल और उसके क़ैदियों को दूसरी जेलों में भेजने पर रोक लगा दी है.

ऐसा बताया जा रहा है कि मायावती जेल को अपनी वर्तमान जगह से हटाकर इसकी ज़मीन को कांशीराम मेमोरियल के इस्तेमाल करना चाहती हैं.

सरकार के लिए झटका

इस परियोजना को लागू करने में पर्यावरण अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन हुआ है और राज्य सरकार को परियोजना के शुरू करने से पहले हर हाल में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी इलाहाबाद हाईकोट

इस परियोजना को लागू करने में पर्यावरण अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन हुआ है और राज्य सरकार को परियोजना के शुरू करने से पहले हर हाल में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से इजाज़त लेनी होगी

अदालत का ताज़ा फ़ैसला राज्य सरकार के लिए ज़ोदार झटका माना जा रहा है, क्योंकि पिछले शुक्रवार को पुलिस भर्ती घोटाले के मामले में राज्य सरकार की किरकिरी हुई थी, जब अदालत ने बर्ख़ास्त पुलियकर्मियों को बहाल करने का आदेश दिया था.

गंगा एक्सप्रेस-वे नाम की इस एक्सप्रेस-वे का निर्माण निजी कंपनियों के ज़िम्मे है और इस टोल टैक्स सड़क मार्ग के निर्माण के लिए सरकार ने निःशुल्क ज़मीन मुहैया कराई है. एक्सप्रेस-वे के साथ निजी कंपनी को जगह-जगह पर औद्योगिक नगर और व्यावसायिक परिसर बनाने का अधिकार दिया गया है.

तीस हज़ार करोड़ के इस प्रोजेक्ट का ठेका जयप्रकाश एसोसियशन के पास है.

बहरहाल सरकार के इस फ़ैसले का विरोध वे हज़ारों किसान भी कर रहे हैं जिनकी खेती की ज़मीन इस परियोजना की ज़द में हैं. दूसरी ओर ज़मीन को व्यापार और उद्योग के लिए देने के मामले में भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

न्यायधीश अशोक भूषण और न्यायधीश अरुण टंडन की बेंच ने ये फ़ैसला गंगा महासभा वाराणसी पर्यावरण सोसाइटी मिर्ज़ापुर की अर्ज़ी पर दिया है.

अदालत ने राज्य के इन्वायर्मेंटल एंपैक्ट असेस्मेंट अथॉरटी के पर्यावरण अनुमति प्रमाण पत्र को स्वीकार नहीं किया और कहा है कि इस तरह के बड़ी परियोजना के लिए अनुमति प्रमाण पत्र देने का अधिकार इस संस्था को नहीं है.

ग़ौरतलब है कि इस परियोजना की घोषणा करते हुए मायावती ने कहा था इससे विकास और रोज़गार के अवसर मिलेंगे.

लेकिन इस परियोजना के विरोधियों ने चेतावनी दी थी कि यदि ये परियोजना लागू होती है तो इसका पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि इससे गंगा की 200 से अधिक सहायक नदियाँ सूख जाएंगी.

अधिकारियों का कहना था कि नदियाँ न सूखें, इसके लिए बड़ी संख्या में जल निकास बनाए जाएंगे, लेकिन अदालत उनके इस तर्क से सहमत नहीं हुई.

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