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सबसे कारगर दवा पर भी भारी हुआ मच्छर

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सबसे कारगर दवा पर भी भारी हुआ मच्छर

वैज्ञानिकों के अनुसार पश्चिमी कंबोडिया में प्रतिरोधक क्षमता के उत्पन्न होने के जो सबूत मिले हैं उससे फ़ौरी तौर पर निपटने की आवश्यकता है, क्योंकि पूरी तरह से प्रतिरोधक क्षमता का विकसित हो जाना, वैश्विक स्वास्थ्य के लिए बड़ी तबाही मचा सकता है.

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि दवा ख़ून से मलेरिया की परजीवी को साफ़ करने में पहले की तुलना में अधिक समय ले रही है.

यानी अब एक तरह से दवा पर मच्छर भारी होता जा रहा है.

हालांकि उनका कहना है कि दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के उत्पन्न होने की ये शुरूआती चेतावनी भर है.

सबसे कारगर दवा के ज़रिए ख़ून से मलेरिया की परजीवी की सफाई में दो से तीन लगते हैं. लेकिन जो ताज़ा मामला आया है उसके अनुसार ख़ून को साफ़ करने में चार से पाँच दिन लग जा रहे हैं.

कंबोडया स्थित बीबीसी संवाददता जिल मैकगिवेरिंग का कहना है कि ये अभी तक पता नहीं चल सका है कि क्यों ये इलाक़ा प्रतिरोधक क्षमता के उत्पन्न होने की नर्सरी बन गया है.

कमज़ोर स्वास्थ्य व्यवस्था पहले भी दो बार, ग़ैर-इरादी तौर पर दक्षिण पूर्व एशिया बाक़ी दुनिया को, विशेष कर अफ़्रीक़ा को मलेरिया की दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का तोफ़ा दे चुका है प्रोफ़ेसर निक डे

पहले भी दो बार, ग़ैर-इरादी तौर पर दक्षिण पूर्व एशिया बाक़ी दुनिया को, विशेष कर अफ़्रीक़ा को मलेरिया की दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का तोफ़ा दे चुका है

उनका कहना है कि स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत ही कमज़ोर है और मलेरिया की दवाओं का इस्तेमाल सही तरह से नियंत्रित नहीं है.

ग़ौरतलब है कि मच्छरों से पैदा होने वाली इस बीमारी से हर साल दुनियाभर में क़रीब 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है.

दुनिया में मलेरिया की सबसे कारगर दवा आर्टेमिसिनिन मानी जाती है. ताज़ा अध्ययन अमरीका और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों की दो टीमों ने अलग-अलग चिकित्सीय परीक्षण के साथ किया और पाया कि दवा अब कम असरदार होती जा रही है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि विशेष चिंता की बात ये है कि इस इलाक़े में मलेरिया की पिछली दवाइयाँ प्रतिरोधक क्षमता के विकसित हो जाने के बाद किसी काम की नहीं रही हैं.

वर्ष 2006 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने चेतावनी दी थी कि मलेरिया की आर्टेमिसिनिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो सकती है.

ब्रितानी टीम के सदस्य प्रोफ़ेसर निक डे का कहना है, "पहले भी दो बार, ग़ैर-इरादी तौर पर दक्षिण पूर्व एशिया बाक़ी दुनिया को, विशेष कर अफ़्रीक़ा को मलेरिया की दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का तोहफ़ा दे चुका है."

उनका कहना है, "यही समस्या है, पहले भी क्लोरोक़्विन और सल्फ़ाडॉक्सीन पाइरीमेथामाइन की प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है और इसकी वजह से कई जानें गँवानी पड़ी थीं."

वो आगे कहते हैं, "अगर ये स्थिति दोबारा घटती हैं तो मलेरिया की दवा के प्रति प्रतिरोधकता का फैलाव अफ़्रीक़ा से एशिया तक होगा, और इससे मलेरिया की रोकथाम पर भयानक असर पड़ सकता है."

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