'प्रजातंत्र की स्थापना का सफ़र लंबा होता है'

'प्रजातंत्र की स्थापना का सफ़र लंबा होता है'

नार्वे स्थित डेमोक्रेटिक वॉइस आफ़ बर्मा (डीवीबी) के लिए कार्यरत इन जाँबाज़ और जुझारू पत्रकारों के अनथक प्रयासों से ही वर्ष 2007 में दुनिया का साक्षात्कार बर्मा की लौह दीवारों के पीछे हो रही उथल पुथल से हो पाया था.

सितंबर 2007 में बर्मा की सैन्य सरकार के ख़िलाफ़ हजा़रों बौद्ध भिक्षुओं ने जब कई बार प्रदर्शन किए और बाद में आम जनता भी सड़कों पर उतर आई तो उसमें जोशुआ और उनके सहयोगियों की भी भूमिका थी.

पिछले दिनों जोशुआ टोरंटों के हॉट डोक्स डॉक्युमेंटरी फ़िल्म महोत्सव में शामिल हुए, जहाँ उनकी डॉक्युमेंटरी फ़िल्म "बर्मा वीजे-रिपोर्टिंग फ्रॉम अ क्लोज़्ड कंट्री" प्रदर्शित हुई.

फ़िल्म का विषय था कि बर्मा की उस समय की घटनाओं का फिल्मांकन आख़िर कैसे हुआ.

इस महोत्सव में 27-वर्षीय रिपोर्टर, जो सुरक्षा की दृष्टि से छद्म नाम जोशुआ से जाने जाते हैं, उपस्थित थे. इसी दौरान वी राधिका ने इस पत्रकार से साक्षात्कार किया. पेश हैं उसके मुख्य अंश-

वर्ष 2007 के घटनाक्रम की वजह से आपको बर्मा छोडना पड़ा. क्या आप कभी लौट पाए अपने देश?

पिछले साल साइक्लोन (चक्रवात) नरगिस के बाद मैं दो बार लौटा, लेकिन गुप्त रूप से.

क्या वजह है, कि इतने ख़तरों को मोल लेते हुए आप पत्रकार बने?

इसलिए कि किसी न किसी को यह कहानी लोगों तक पहुँचानी पड़ेगी. मैं जानता हूँ कि इस काम में मुझे ख़तरा है, लेकिन मैं जब-जब अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और अन्य देशों की ख़बर देखता और पढ़ता हूँ तो मन में सवाल उठता है बर्मा क्यों नहीं? हमारे देश की समस्याएँ अन्य देशों से कम नहीं हैं, तो बर्मा कभी सुर्ख़ियों में क्यों नहीं? इसलिए मैंने ये काम करने का निश्चय किया.

आपके इस निर्णय को किन घटनाओं ने प्रेरित किया?

सन् 1988 में हमारे देश में एक बड़ी एवं महत्वपूर्ण घटना घटी जब हज़ारों लोग प्रजातंत्र के लिए जन आंदोलन में शामिल हुए. मैं तब बहुत छोटा था लेकिन मेरे कई भाई बंधुओं ने प्रदर्शनों मे हिस्सा लिया था. अब जब वक़्त आया तो मैं भी वही कर रहा हूँ. शुरुआत में मैंने दीवार लेखन, पोस्टर बनाना और बुलेटिन बाँटने का काम किया, लेकिन मैं जानता था कि अकेले मैं ज़्यादा कुछ कर नहीं सकता. अपने साथ और लोगों को जोड़ने की ज़रूरत थी.

मुझे लगा मीडिया इस दिशा में सबसे प्रभावशाली माध्यम है. मैंने सरकारी मीडिया में भी काम किया लेकिन वहाँ इतनी बंदिशें थीं कि सही मायनों मे पत्रकारिता करना असंभव था. मैं बर्मा की यथार्थ स्थिति सामने लाना चाहता था और डीवीबी के संपर्क मे आने के बाद मेरी गणना बर्मा के अग्रणी टीवी कैमरामैन में हो गई.

अपनी पहली रिपोर्ट शूट करते समय आपके मन की स्थिति क्या थी?

जब मैं कैमरा हाथ में लेता हूँ तो मुझे भी डर लगता है और यह स्वाभाविक है लेकिन जब आप कैमरे के एलसीडी पर अपने काम का नतीजा देखते है तो डर का ख़्याल नहीं आता. यही तो हमारा काम है. एकाग्रता से लक्ष्य साध लें तो डर स्वयं भाग खडा़ होता है. अपने काम के दौरान मैंने विभिन्न कैमरामेन के साथ काम किया है और कई नाकामयाब भी रहे. कैमरा तो बहुत लोगों के पास होता है लेकिन घटना को हू-ब-हू कैमरे में क़ैद करने के लिए हिम्मत चाहिए. इस दुस्साहस के बूते ही आप यथार्थवादी पत्रकारिता की कसौटी पर खरे उतरते हैं.

अपने काम और साथियों से दूर रहने के दौरान आपकी स्थिति क्या होती है?

अपने काम का परिणाम समक्ष देखकर ही स्वयं को संतुष्टि मिलती है कि आपने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है और साथ ही आगे बढ़ने की हिम्मत भी मिलती है. शुरू मे जब बर्मा छोड़ना पड़ा तो बहुत बुरा लगा, ऐसा लगा की अब मैं कुछ कर नहीं सकता, मैं पत्रकार नहीं रहा, पर जल्द ही एक दूसरी भूमिका भी सामने उभर आई.

आप जब फ़िल्ड में होते है तो कई बार आपका लक्ष्य सिर्फ़ अपनी रिपोर्ट तक ही सीमित होता है, लेकिन कभी कभी वहां से दूर होकर आपका दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है.

कई बार फील्ड पर हमें लगता है कि फलां कहानी महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन बाहर की दुनिया उसमें दिलचस्पी ले सकती है. पहले हम सिर्फ़ अपनी समझ से काम करते थे, लेकिन बाहर आने के बाद मैंने दुनिया देखा, मेरी समझ व्यापक हुई. अब मैं अपने साथियों को सुझाव दे सकता था कि हम बेहतर रिपोर्ट कैसे तैयार कर सकते हैं. बर्मा से दूर थाइलैंड मे बैठकर अपने साथियों से संपर्क बनाए रखना और देश की घटनाओं से अवगत रहना मेरे करियर में एक नया मोड़ लाया.

अपने सहकर्मियों या क़रीबी दोस्त या संबंधी के काम के दौरान मृत्यु होने पर आप ख़ुद को कैसे सांत्वना देते हैं?

काफ़ी तकलीफ़ होती है पर आप कुछ कर नहीं सकते. कई बार मैं ख़ुद को यही कहके समझा लेते हूँ कि उन्हें अपने काम पर गर्व था. बलिदान कई बार आवश्यक हो जाता है लेकिन अगर आपको अपने काम पर गर्व है तो वह बलिदान सार्थक हो जाता है. आपके साथ और भी लोग हैं, यही एहसास आपकी हिम्मत बरक़रार रखता है.

वर्ष 1988 के बाद 20 साल लगे थे दूसरे आंदोलन को जन्म लेने में. अब जबकि वह आंदोलन भी कुचला गया, आपको भविष्य कैसा दिखता है?

मैं इस आंदोलन को 2007 में शूट कर रहा था, बीच में ही मुझे थाईलैंड जाना पड़ा तब बहुत हताशा हुई थी. लेकिन अब मुझे आभास है कि 20 साल एक व्यक्ति मात्र के जीवन के लिए बहुत हो सकते हैं परन्तु एक देश की तानाशाही को प्रजातांत्रिक बनाने के लिए बहुत कदापि नहीं. हमें और समय चाहिए, हमें अभी बहुत काम करना होगा लेकिन हालात बदल रहे हैं. पहले लोग कैमरा एवं टेप रेकार्डर से डरते थे. सामना होने पर हर कोई भाग खड़ा होता था, क्योंकि बात करना उनके लिए भी घातक था.

लेकिन 2007 के प्रदर्शन एवं नरगिस चक्रवात के बाद से लोग पत्रकारों को तलाशते हैं. लोग आगे बढ़कर अपनी कहानी सुनाने के लिए आतुर हैं. अब वे समझते हैं कि हम उनकी मदद कर सकते हैं. मीडिया एवं प्रचार के महत्व और उपयोगिता से वे भी अवगत हुए हैं.

बतौर उदाहरण, 2008 में सेना ने कुछ ग़रीब किसानों की ज़मीन ज़ब्त की तो हमने उस प्रसंग को कवर किया. सरकार ने उन किसानों को जेल में डाल दिया. पर जब हमने लगातार इस प्रसंग को कवर किया तो आख़िरकार न केवल उन किसानों को रिहा कर दिया गया बल्कि उनकी ज़मीन भी लौटा दी गई. ऐसे कई उदाहरण आभास देते हैं कि माहौल बदल रहा है .

क्या मीडिया में काम करने के इच्छुक युवाओं की संख्या बढी है?

जब मैंने काम शुरू किया तब मैं सबसे छोटा था और अब मेरी गणना डीवीबी के वरिष्ठ पत्रकारों में होती है. बौद्ध भिक्षुओं के प्रदर्शन के दौरान लोगों ने मीडिया की ताकत देखी.

लोग अब पत्रकार कहलाने में गर्व महसूस करते हैं. कई शिक्षित युवा हमसे संपर्क करते हैं. वे बतौर रिपोर्टर ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी हमारे साथ काम करना चाहते हैं, जैसे संशोधन, लाइब्रेरी इत्यादि. कई बार तो हमें मना करना पडता है, क्योंकि हमारे पास इतने साधन ही नहीं हैं.

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