मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच की माँग

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने श्रीलंका में सरकार और विद्रोहियों की ओर से आम लोगों पर की गई कथित ज्यादतियों की जाँच की माँग की है.संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के जिनेवा में शुरू हुए आपात सत्र में मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्लई ने कहा कि ऐसा करके ही श्रीलंका में स्थाई शांति स्थापित की जा सकती है.
इस माँग को श्रीलंका सरकार ने ठुकरा दिया है और जाँच के बजाए श्रीलंका के पुनर्निनिर्माण के लिए और आर्थिक सहायता की माँग की है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त का कहना था कि इस बात को मानने के पर्याप्त कारण है कि दोनों पक्षों ने आम लोगों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन किया.
उनका कहना था कि स्वतंत्र और अंतरराष्ट्रीय जाँच से मानवाधिकार हनन की घटनाओं, प्रकृति और स्तर का पता चल पाएगा, साथ ही इससे ज़िम्मेदारी भी तय हो पाएगी.
'जाँच ज़रूरी'
उनकी बात का संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार मामलों के अधिकारी जॉन होम्स ने समर्थन किया है. इस बात को मानने के पर्याप्त कारण है कि दोनों पक्षों ने आम लोगों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन किया नवी पिल्लई, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त
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उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा कि यदि श्रीलंका को इससे उबरकर आगे बढ़ना है तो इसके लिए जाँच ज़रूरी है.
जॉन होम्स का कहना था कि तमिल विद्रोहियों ने आम लोगों को मानवकवच के रूप में इस्तेमाल किया जो बहुत ही अमानवीय और क्रूर तरीका था. दूसरी ओर श्रीलंका सेना की गोलाबारी से आम नागरिक बुरी तरह प्रभावित हुए.
हालांकि दोनों ही पक्ष इन आरोपों से इनकार करते आए हैं. मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों का आरोप है कि देश के गृह युद्ध के अंतिम चरणों में तमिल टाइगर विद्रोही और श्रीलंका सेना दोनों ने ही युद्धापराध किया है.
उल्लेखनीय है कि हाल में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने श्रीलंका में शरणार्थी शिविरों का दौरा किया था. उस दौरान श्रीलंका सरकार ने विश्वास दिलाया था कि वह मानवाधिकारों की रक्षा और उससे जुड़ी चिंताएँ दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है.इस समय भी श्रीलंका के सरकारी शिविरों में संघर्ष से विस्थापित लगभग ढाई लाख लोग रह हैं और उनको लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित है.


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