तमिलों का भारत से श्रीलंका का समर्थन न करने का अनुरोध
टोरंटो, 27 मई (आईएएनएस)। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के बाद अब कनाडा में रहने वाले तमिलों ने भी मनमोहन सिंह सरकार से अनुरोध किया है कि वह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के पक्ष में लाए जाने वाले प्रस्ताव का समर्थन नहीं करे।
भारत, चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका और अन्य देशों की ओर से लाए गए प्रस्ताव के मसौदे में विस्थापितों की समस्या से निपटने के श्रीलंका सरकार के तरीकों की सराहना करते हुए उसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहायता की मांग की गई है।
यह प्रस्ताव 30 पश्चिमी देशों की ओर से लाए जा रहे प्रस्ताव के जवाब लाया जा रहा है। पश्चिमी देशों के प्रस्ताव में गृहयुद्ध के दौरान श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों दोनों की ओर से किए गए मानवाधिकारों के हनन की जांच की बात कही गई है।
प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में करुणानिधि ने कहा है, "दुनिया भर में रहने वाले लाखों तमिलों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र को श्रीलंका सरकार की ओर से सौंपा गया प्रस्ताव श्रीलंकाई तमिलों के विरुद्ध है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि श्रीलंकाई तमिलों की भावनाओं और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस सिलसिले में उपयुक्त निर्णय लें।"
कनाडा में रहने वाले तमिलों ने भारत को 'पितृभूमि' करार देते हुए मंगलवार को कहा श्रीलंका को युद्धअपराधों से दोषमुक्त करार देने संबंधी प्रस्ताव को भारत का समर्थन स्तब्धकारी है।
कनाडियन तमिल कांग्रेस के प्रवक्ता डेविड पूपलापिल्लई ने कहा, "तमिलों के सशस्त्र संघर्ष का दौर अब समाप्त हो गया है। अब समय आ गया है कि भारत बेजुबान तमिलों की आवाज बने। अतीत की बात करना अब बेमानी है। यह हमारे इतिहास का नया दौर है।"
उन्होंने कहा, "हमें यह देखकर बेहद दुख हो रहा है कि दुनिया को न्याय के गांधीवादी सिद्धांतों का पाठ पढ़ाने वाला देश मानवाधिकारों का हनन करने वाले देश से हाथ मिला रहा है। पितृभूमि भारत को अपनी तमिल संतानों के लिए आगे आना चाहिए।"
उन्होंने कहा कि तमिल भारत की बाध्यता समझते हैं। उन्होंने कहा, "लेकिन श्रीलंका का समर्थन नहीं करके तटस्थ रहकर भारत हमारे लिए कुछ कर सकता है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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