महिलाओं की आवाज़ बना कम्यूनिटी रेडियो

आंध्रप्रदेश के पासतापुर गाँव में स्थानीय कम्यूनिटी रेडियो महिलाओं के लिए खेतीबाड़ी की सूचना देने के साथ-साथ एक आवाज़ बन कर उभरा है. डेक्कन डेवलपमेंट सोसायटी (डीडीएस) से जुड़ी एक कार्यकर्ता टी मंजुला लोगों के घर जाकर पैदावार के बारे में पूछताछ करती है और खाद्य वितरण करती हैं. ये उनके नियमित काम का हिस्सा तो है मगर वह अपनी रेडियो पत्रकार की भूमिका को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं.
पस्तापुर के एक साधारण घर में बने स्टूडियो से हर दिन दो घंटे प्रसारित होने वाले रेडियो कार्यक्रम में खेतीबाड़ी, स्वास्थ्य और संगीत के बारे में छोटी-बड़ी जानकारी दी जाती है. गाँव में ज्यादातर ग़रीब दलित महिलाएँ हैं. टी मंजुला भी भारतीय समाज के हाशिए पर रहने वाली एक जाति से ताल्लुक रखती हैं.
वह कहती हैं, "स्थानीय स्तर पर मौजूद ज्ञान के भंडार को इकट्ठा करना हमारे लिए सुखद अनुभव है. यदि ऐसा नहीं करते तो ये अनुभव परिवारों में ही सिमट कर रह जाते." मंजुला का कहना है, "कई लोगों को इससे फ़ायदा हुआ है और मैं हर दिन कुछ नया सीख रही हूँ." कम्यूनिटी रेडियो गाँव में इस कदर चर्चित हुआ है कि गाँव की कई महिलाएँ रेडियो कार्यक्रम में अपना योगदान दे रही है.
जानकारी के साथ आमदनी भी
यदि मैं रेडियो प्रोड्यूसर नहीं बनी होती तो घर वालों की तरह ही खेत में काम करती. मेरे हाथ में माइक्रोफ़ोन नहीं बल्कि कुदाल होता एलगोल नरसम्मा, रेडियो प्रोड्यूसर
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खेतीबाड़ी के काम के अलावा एच लक्ष्मम्मा कम्यूनिटी रेडियो के लिए हर महीने क़रीब 10 घंटे का कार्यक्रम तैयार करती है. वह कहती हैं कि इससे उन्हें क़रीब 450 रुपए हर महीने मिलते हैं जिससे वह अपने घर वालों के लिए खाद्य सामग्री ख़रीदती हैं.
लक्षम्मा के पति ने कई वर्ष पहले उन्हें छोड़ दिया था. वह अपनी एक बच्ची का लालन-पालन ख़ुद करती हैं साथ ही वह डीडीएस की प्रमुख सदस्य भी बन गई हैं. गाँव में महिलाओं का जीवन कठिन है. औपचारिक शिक्षा के अभाव में वे पास के खेत में मज़दूरी करती हैं.
गाँव में कम्यूनिटी रेडियो के आने से पहले उन्हें खेतीबाड़ी के क्षेत्र में इस्तेमाल किए जाने वाली नई तकनीकी, कैसे अपने फसल को बेहतर दामों में बेचा जाए इसकी बहुत कम जानकारी रहती थी. वे आस-पड़ोस को लोगों से बात कर या खेत में साथ काम करने वाले मज़दूरों से ही जानकारी जुटाती थीं. कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से अब वे ज्यादा से ज्यादा जानकारी पा रही हैं.
बुज़ुर्ग भी
गाँव में ख़ासकर दलित महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है. न सिर्फ़ युवतियाँ बल्कि बुज़ुर्ग भी अपने दैनिक दिनचर्या में रेडियो को शामिल कर रहे हैं. रेडियो कार्यक्रमों को सुनने के साथ-साथ वे कार्यक्रमों के लिए गाने भी रिकॉर्ड करती हैं. जीवन भर संघर्ष करने वाली इन महिलाओं के लिए रेडियो पर अपनी आवाज़ सुनना एक बड़ी उपलब्धि है.
दो घंटे के रेडियो कार्यक्रम को दो महिलाएँ मिल कर तैयार करती हैं जिनमें से एक 25 वर्षीया एलगोल नरसम्मा हैं. एलगोल नरसम्मा कहती हैं, "यदि मैं रेडियो प्रोडयूसर नहीं बनी होती तो घर वालों की तरह ही खेत में काम करती. मेरे हाथ में माइक्रोफ़ोन नहीं बल्कि कुदाल होता."
कई महिलाओं के जीवन पर इस कम्यूनिटी रेडियो का गहरा असर पड़ा है. डीडीएस आने वाले समय में अपने इस प्रोजेक्ट को जारी रखते हुए अन्य इलाको़ और गाँवों में भी कम्यूनिटी रेडियो शुरू करना चाहता है.फिलहाल रेडियो के कार्यक्रमों को चलाने के लिए विकसित संस्थाओं की तरफ़ से पैसा मिल रहा है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उन्हें ऐसे विज्ञापन मिलने लगेंगे जिससे उन्हें फ़ायदा होगा.


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