बिहार के नतीज़ों की ज़मीनी सच्चाई

बिहार के चुनावी नतीज़े देश के राजनीतिक रुझान के विपरीत आए पर यदि यूपीए के घटक आपस में मिलकर चुनाव लड़ते तो नतीज़े कुछ और होते...
ये नतीज़े कम से कम दो मायनों में बिल्कुल अलग नज़र आते हैं. पहला यह कि यहाँ भाजपा-जनता दल (यू) को बड़ी जीत मिली और दूसरा यह कि कांग्रेस को फ़ायदे की जगह एक सीट का नुक़सान उठाना पड़ा.
गठबंधन का अभाव
दिलचस्प बात यह है कि राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की कांग्रेस की रणनीति से उसके विरोधी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को ज़बरदस्त फ़ायदा हुआ.
वहीं कांग्रेस के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के सहयोगियों राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) को भारी हार का मुँह देखना पड़ा.
चुनाव में मिले वोटों के आंकड़े बता रहे हैं कि अगर यूपीए की घटक पार्टियाँ राजद, लोजपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी काग्रेस पार्टी (राकांपा) एक साथ मिलकर चुनाव लड़तीं तो कम से कम 13 और सीटों पर यूपीए जीत सकता था.
चुनाव में मिले वोटों के आंकड़े बता रहे हैं कि अगर यूपीए की घटक पार्टियाँ राजद, लोजपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी काग्रेस पार्टी एक साथ मिलकर चुनाव लड़तीं तो कम से कम 13 और सीटों पर यूपीए जीत सकता था
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इन पार्टियों जो अलग-अलग वोट मिले हैं, अगर वे जुड़ जाते तो उजियारपुर, सीतामढ़ी, जहानाबाद, जमुई, काराकाट, जंझारपुर, गया, बांका, मुज़फ़्फ़रपुर, अररिया और मधुवनी में यूपीए उम्मीदवारों को बढ़त मिल जाती.
अगर ऐसा हो जाता तो मामला 32 बनाम 8 की जगह 21 बनाम 19 का हो सकता था.
कांग्रेस को मुसलमानों का वोट भी एकमुश्त नहीं बल्कि अंशों में मिला. इसलिए उसे फ़ायदा भी नहीं हुआ.
लेकिन कांग्रेस ने बिहार में 'हम तो डूबे हैं सनम, तुमको भी ले डूबेंगे' की तर्ज़ पर लालू-रामविलास के गठबंधन से बदला ले लिया. बदला उस तिरस्कार का जो तीन सीटों का टुकड़ा फेंकने जैसे अपमानजनक बंटवारे से उभरा था. इसलिए अब लालू और रामविलास दोनों इस भूल पर अफ़सोस जता रहे हैं.
लेकिन सारा खेल सिर्फ़ इसी बिखराव की वजह से नहीं बिगड़ा. इसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'अतिपिछड़े' और 'महादलित' कार्ड ने भी बड़ा असर दिखाया.
एम-वाई फ़ार्मूला फ़ेल हुआ
इसका असर ठीक वैसा ही था जैसा कभी मुसलिम-यादव एकजुटता वाले लालू के फ़ार्मूले का हुआ करता था.
जनता दल (यू) -भाजपा को असली ताक़त इन्हीं अतिपिछड़ों और महादलितों से मिली. अतिपिछड़ा समुदाय के चार उम्मीदवार जीत गए. इनमें तीन जद (यू) के और एक भाजपा का है. अतिपिछड़े और महादलित बिहार में जद (यू) का एक बड़ा वोट बैंक बन गए लगते हैं.
बिहार में इस बार के चुनावी नतीज़े देश की राजनीति के रुझान के विपरीत आए हैं. इस बार राष्ट्रीय स्तर का संकेत पाकर बिहार में भी कांग्रेस की धारा की ओर मुड़ने वाले मुस्लिम मतदाताओं ने लालू-रामविलास गठबंधन की ज़मीन खिसका दी.
वहीं यादव मतदाताओं में विभाजन की मार लालू पर पड़ी और इसीलिए राजद को मात्र चार सीटें मिली हैं. उनमें से तीन राजपूत और एकमात्र यादव (ख़ुद लालू) हैं.
पाटलिपुत्र में लालू की हार उनके मुस्लिम-यादव जनाधार वाले दावे की हार है. चुनाव में लालू का साथ तो कांग्रेस ने छोड़ दिया लेकिन यहाँ बिना साथी के आगे बढ़ निकलने की तैयारी कांग्रेस ने नहीं की थी. इसलिए मुस्लिम समर्थन भी उसके काम नहीं आया.
वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अब यह चिंता सता रही है कि भाजपा के साथ रहते वे मुस्लिम हितों के लाख फ़ैसले कर लें, उसका ज़्यादा राजनीतिक फ़ायदा उन्हें नहीं मिलने वाला है.
हम अगर विश्लेषणों पर ग़ौर करें तो बिहार में राजग की जीत के लिए मुख्य रूप से विकास वाले मुद्दे को आधार बनाने वाला प्रचार ज़मीनी सच्चाई से बहुत दूर नहीं तो बहुत क़रीब भी नहीं लगता है. इससे ज़्यादा तर्कसंगत तो शांति व्यवस्था वाली बात लगती है.


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