अपने 'आइडिया ऑफ इंडिया' के लिए मनमोहन की एक और पारी
नई दिल्ली, 21 मई (आईएएनएस)। ठीक पांच साल पहले देश के प्रधानमंत्री के रूप में पद व गोपनीयता की शपथ लेने वाले डा. मनमोहन सिंह के हाथों में शुक्रवार से लगातार दूसरी बार देश की बागडोर होगी। यह उनके निजी व्यक्तित्व, उनके सुशासन और उनकी नीतियां का ही नतीजा था जिनके चलते देश ने आर्थिक क्षेत्र में तेजी से और समेकित विकास किया और जनता ने इसके बदले उन्हें सिर आंखों पर बिठाया और तख्तोताज उनके हवाले कर दिया।
मनमोहन का लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनना बहुत मायने रखता है। उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री साबित करने के न जाने कितने प्रयास हुए। उनकी पार्टी के ही लोग यह मानते थे कि उनमें राजनीतिक कौशल का अभाव है और वह चुनाव जिताने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन उन्होंने इन सब धारणाओं को गलत साबित कर दिखाया। उन्हें अब एक कामयाब व सक्षम नेता के रूप में देखा जाने लगा है। ब्रिटेन के लार्ड मेघनाद देसाई ने एक दफा ठीक ही कहा था, "मनमोहन में विचारों को अमली जामा पहनाने वाले राजनेताओं के सभी गुण तो मौजूद हैं ही, साथ-साथ आर्थिक विशेषज्ञता भी है जो उन्हें सबसे अलग बनाती है।"
देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण ओहदों की शोभा बढ़ा चुके मनमोहन के पास देश को आगे ले जाने की एक स्पष्ट दृष्टि है। इसी स्पष्ट दृष्टि को उन्होंने पहली बार उस समय नीतियों में तब्दील किया जब पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव की सरकार में उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। उनके इस कार्यकाल को देश के आर्थिक इतिहास के बहुत बड़े 'टर्निग प्वाइंट' के रूप में देखा जाता है। आर्थिक सुधारों के जरिए उन्होंने देश को एक नई दिशा दी।
मनमोहन के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे स्वर्गीय जे. एन. दीक्षित कहा करते थे कि जवाहरलाल नेहरू के बाद मनमोहन सिंह ही दिमागी तौर पर सबसे मजबूत प्रधानमंत्री हैं।
बहरहाल, मनमोहन से अब देश को बहुत उम्मीदें हैं। लोगों ने देश के बारे में उनके विचारों का सम्मान किया है। पिछले साल 21 नवम्बर को हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में मनमोहन सिंह ने कहा था, "दुनिया को घेर रहे आर्थिक व सामाजिक संकट का कारण पनप रही उग्रवादी विचारधाराएं और राजनीतिक व आर्थिक शक्तियां हैं जिसका विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। देश इन ताकतों को दरकिनार करने के विचार पर यकीन रखता है। हमें विभिन्नता का सम्मान करते हुए मध्य मार्ग अपनाना पड़ेगा। तभी मानवता के विकास के नए रास्तों पर हम चल सकेंगे।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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