श्रीलंकाई तमिलों का क्या होगा?

वीआर राघवन, रक्षा विश्लेषक
तमिल विद्रोही नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण से मिल चुके भारतीय रक्षा विश्लेषक रिटार्यड मेजर जनरल वीआर राघवन मानते हैं कि ऐसी परिस्थिति में एलटीटीई की सैन्य शक्ति समाप्त मानी जानी चाहिए.
हालाँकि तमिल विद्रोही हथियार छिपाने में काफ़ी चतुर हैं और हो सकता है कि अभी भी उनके कुछ लड़ाकों ने हथियार छिपा रखे हों. लेकिन इस स्थिति में तमिल आंदोलन का नेतृत्व समाप्त माना जाए, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा नेतृत्व नहीं था. अब ये नेतृत्व कहाँ से आएंगा, इस बारे में कई शंकाएं हैं.
राघवन के अनुसार अब सारा मामला इस बात पर निर्भर करता है कि श्रीलंका में राजपक्षे सरकार इस मामले को कैसे हल करती है और सिन्हला लोगों की इस पर क्या प्रतिक्रिया रहती है? ये भी महत्वपूर्ण होगा कि तमिलों को जो अधिकार दिए जाने हैं उनका क्या होता है और पुनर्निर्माण के लिए क्या किया जाता है.
जहाँ तक भारत की चुनौती का सवाल है, भारत को अपने रास्ते पर चलना होगा और श्रीलंका की सरकार को यह बार-बार बताना होगा कि तमिलों को उनके संवैधानिक अधिकार हर हाल में मिलें. इस दिशा में ख़ासकर श्रीलंकाई संविधान के 13वें संशोधन में जो वादे भारत से किए गए हैं उन्हें लागू करवाना होगा और जब तक ऐसा नहीं होता पूर्वोत्तर श्रीलंका में शांति नहीं होगी.
टीवी श्रीराम, कोलंबो स्थित पत्रकार
तमिल समुदायों की फ़िलहाल ऐसे स्थिति है जैसे कि किसी घर में कैंसर पीड़ित का देहांत हो जाने पर थोड़ा चैन का आभास होने की स्थिति में होती है.
तमिलों के साथ-साथ पूरा देश इतने लंबी चली लड़ाई, गोलाबारी, बमबारी, आत्मघाती हमलों से ऊब चुका था. सभी समुदाय चैन चाहते थे और प्रभाकरण के देहांत की ख़बर आने के बाद लोगों में बेचैनी ख़त्म हुई है.
नारायणस्वामी, श्रीलंका मामलों के जानकार
प्रभाकरण को दो तरह से लोग याद किया जाएगा. लोगों का एक ऐसा समूह होगा जो उन्हें उस लड़ाके के तौर पर याद करेगा जिसने किसी भी हालत में समझौता नहीं किया, जिसने राजनीति और कुर्सी के लिए लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि वो तमिलों के लिए लड़ा और अंत में अपनी जान भी दे दी.
दूसरा ऐसा समूह होगा जो कहेगा कि उनकी इस लडा़ई से तमिलों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ. वे कहेंगे कि ये लड़ाई 25 साल से अधिक चली और हज़ारों लोग मारे गए. लेकिन उसके बाद भी तमिल बिरादरी को कुछ नहीं मिला...


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