दूसरा लिट्टे नहीं बन सकताः करुणा

जिन मुट्ठीभर लोगों ने प्रभाकरन के शव की शिनाख्त की उनमें करुणा भी थे। वह लंबे अर्से तक प्रभाकरन के विश्वस्त रहे थे लेकिन मार्च 2004 में उन्होंने हजारों साथियों के साथ सनसनीखेज ढंग से उसके खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था जिससे लिट्टे को बहुत क्षति पहुंची थी।
राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के मंत्रिमंडल में राष्ट्रीय एकीकरण एवं सुलह मंत्री करुणा ने कहा कि उन्हें इस बात की शिनाख्त करने में पल भर नहीं लगा कि स्ट्रेचर पर पड़ा शव किसी और का नहीं, बल्कि प्रभाकरन का ही है। जो किसी जमाने में उनका पथप्रदर्शक और नेता रह चुका था। करुणा ने कहा, "वह पहले से कुछ दुबला लग रहा था। वैसे काफी हद तक वह पहले जैसा ही था। वही चेहरा, वहीं आंखें..वह प्रभाकरन ही था।"
करुणा ने बताया, "प्रभाकरन का खात्मा करने वाले सैनिकों को उसे देखकर यकीन ही नहीं हुआ क्योंकि उनमें से बहुत से लोगों ने तो यह सोच लिया था कि प्रभाकरन खुद को खत्म कर चुका है। उन्हें प्रभाकरन को देखने की कतई उम्मीद नहीं थी।" प्रभाकरन और उसके साथियों के साथ संघर्ष सोमवार तड़के चार बजे मुल्लइतिवू के एक लगून के समीप शुरु हुआ और महज 90 मिनट में ही निपट गया। जिसकी परिणति उस शख्स की मौत में हुई जिसने 25 वर्ष से ज्यादा अर्से तक देश को दहशत में रखा था।
श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के उपाध्यक्ष करुणा ने इस बात की पुष्टि की कि प्रभाकरन के सिर का ऊपरी हिस्सा उड़ चुका था। तब तक सेना उसके पुत्र चार्ल्स एंथनी और उसके वरिष्ठ साथियों को भी मौत की नींद सुला चुकी थी। राजनीतिज्ञ बन चुके करुणा ने ऐसी संभावना से इंकार किया कि लिट्टे के आत्मसमर्पण कर चुके सदस्य या विदेशों में मौजूद समर्थक फिर से ऐसा कोई संगठन खड़ा कर सकते हैं।
करुणा ने बड़े यकीन के साथ कहा, "यह असंभव है। अब वैसी परिस्थितियां और हालात नहीं हैं कि ऐसा कुछ हो सके। लोग हिंसा से आजिज आ चुके हैं। किसी और लिट्टे के उदय की अब कोई संभावना नहीं।" बट्टिकलोवा के रहने वाले करुणा 1993 में लिट्टे में शामिल हुए थे और पूरे पूर्वी प्रांत के कमांडर बनने में कामयाब रहे थे। वर्षो तक वह प्रभाकरन के वफादार माने जाते रहे। वर्ष 2002-03 में श्रीलंका सरकार से बातचीत करने वाले लिट्टे के प्रतिनिधिमंडल में वह भी शामिल थे। अप्रैल 2002 में जब प्रभाकरन ने मीडिया को संबोधित किया तो उसके साथ वह भी थे।
करुणा ने प्रभाकरन की मौत के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि अगर वह बेहतर रणनीति बनाता और पिछले साल श्रीलंकाई सेना का अभियान शुरू होते ही अपने लड़ाकों और वरिष्ठ नेताओं को तितर-बितर कर देता तो वह बच सकता था।
करुणा ने कहा, "लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे पता चलता है कि वह बेवकूफ था। उसने शायद सोचा होगा कि नागरिकों की तकलीफों की वजह से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय संभवत: संघर्ष विराम कराने में कामयाब हो जाएगा और वह बच निकलेगा।"
करुणा ने कहा, "अगर वह अच्छा नेता होता तो उसने इतने लंबे अर्से तक आजाद मुल्क की मांग नहीं की होती। वह समझ गया होता कि यह कभी नहीं होगा। अगर वह अपनी सैन्य कामयाबियों को राजनीतिक कामयाबियों में तब्दील कर देता तो आज तमिलों का सर फख्र से ऊंचा होता। पर ऐसा नहीं हुआ।"
करुणा ने कहा कि उन्होंने प्रभाकरन और लिट्टे के राजनीतिक प्रकोष्ठ के नेता एस.पी. तमिलसेल्वम से बदलते वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए लिट्टे में सुधार करने को कहा था लेकिन उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। लिट्टे में बिताए समय को याद करते हुए उन्होंने कहा, "समस्या यह है कि प्रभाकरन के कुछ करीबियों ने उसका अहंकार बढ़ा दिया था। उन्होंने उसे यकीन दिला दिया था कि उसका पतन नहीं हो सकता, वह कभी परास्त नहीं हो सकता। उसे गुमराह किया गया।"
उन्होंने कहा कि तमिलों के आगे अब लोकतंत्र का रास्ता ही बचा है। यही एकमात्र रास्ता है। उन्होंने कहा, "कल्पना कीजिए अगर हम कोई अच्छा संसदीय गुट होते तो हमने तमिलों के लिए शानदार काम किया होता, यहां तक कि इस काले दौर में भी।" लिट्टे समर्थक टीएनए का हवाला देते हुए करुणा ने कहा कि वह बेकार है।
करुणा ने कहा कि 1983 से जारी इस संघर्ष में 24,000 लिट्टे विद्रोहियों समेत 90,000 लोगों को खो देने के बाद तमिल समुदाय के पास अब और कोई रास्ता नहीं बचा है। यह पूछने पर इस सारे खून-खराबे के बाद तमिलों को क्या हासिल हुआ? करुणा ने कहा, "कुछ भी नहीं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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