माया का सपना टूट गया...

माया को सपना दिखाने में वाममोर्चा आगे था. इसी मकसद से माया वामदलों की अगुवाई में तीसरे मोर्चे की नाव पर चढ़ गई थीं. वह नाव बीच मझधार डूब गई है.
तीसरे मोर्चे की नाव पर बैठे तमाम सवार तैर कर इधर उधर निकल लिए, माया तैरकर यूपीए की तरफ निकल आई है और किनारे पर बाहर से ही समर्थन देने का ऐलान किया है.
केंद्र में सरकार बनाने जा रही कांग्रेस का भय माया को सता रहा होगा. सुना है केंद्रीय जाँच ब्यूरो से माया बेहद घबराती हैं. साथ ही उत्तर प्रदेश में इतनी बुरी हार ने उनको भविष्य के प्रति भी सर्तक भी कर दिया है.
माया दो साल से बहुजन समाज पार्टी का विस्तार करने में जुटी थी जिसके चलते बहुजन की पार्टी सर्वजन बन गई.
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2007 में सरकार बनाने के बाद से ही वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह तलाश रही थीं. उन्हें भरोसा था कि पार्टी 50 सीटें उत्तर प्रदेश से जीत लेगी.
मोलभाव का मौका नहीं
झूठे चुनावी विशेषज्ञों का मानना था कि इस संख्या के बलबूते माया लोकसभा में मन माफिक मोलभाव करेगी.
लेकिन चुनावी नतीजों ने उनका दिल तोड़ दिया. वर्ष 2007 में विधानसभा की सफलता दोहराने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त बसपा को लोकसभा चुनाव ने दिन में तारे दिखा दिए हैं.
बसपा के 15वीं लोकसभा चुनाव में भी दलित वोट बैंक में मुस्लिम और ब्राह्मण का तड़का लगा कर सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग चल नहीं पाया.
बसपा अध्यक्ष मायावती ने 80 लोकसभा सीटों में से बीस पर ब्राह्मण, छह सीटों पर ठाकुर और 14 पर मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था. इनमें से पांच ब्राह्मण, चार ठाकुर और चार मुस्लिम प्रत्याशी ही जीतकर आ पाए.
माया अपने पाले में मिली हार से खिसियाकर खंभा नोंच रही है. खंभा नोचते नोचते उन्होंने यूपी में सभी निगमों के चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन और सदस्यों के इस्तीफ़े ले लिए हैं. अब इन बेचारों पर गुस्सा उतारकर क्या हासिल होगा.
सच तो ये है कि आपने बहुतों का जनाधार खिसकाया है अब आपकी बारी है मैडम. बहुत हो ली आपकी दलित राजनीति. दलित के नाम पर आपने पत्थर की मूर्तियाँ और पार्क बनाने के अलावा और किया ही क्या है?
सुना है 16 मई की रात से माया को सपने आने बंद हो गए हैं.


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