राजीव हत्याकांड का मुकदमा बंद करने के लिए श्रीलंका से सबूत मांगेगा भारत
नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 18 साल पहले हुई हत्या से जुड़े मुकदमे को बंद करने के लिए भारत श्रीलंका से लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन और उसके खुफिया प्रमुख की मौत का सबूत मांगेगा।
इस जघन्य हत्याकांड के आखिरी दो संदिग्ध प्रभाकरन और पुट्ट अम्मान अब तक भारत में वांछित हैं। गांधी की 21 मई 1991 में चेन्नई के निकट एक रैली में महिला आत्मघाती हमलावर द्वारा किए गए विस्फोट में हत्या कर दी गई थी।
शुरुआत में तो लिट्टे ने गांधी की हत्या में हाथ होने से इंकार किया था लेकिन बाद के वर्षो में उसके नेताओं ने निजी तौर पर या अन्य तरीकों से उनकी मौत पर खेद जाहिर करना शुरु कर दिया। इसी हत्याकांड की वजह से 1992 में लिट्टे को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया।
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इस नतीजे पर पहुंचा था कि गांधी की हत्या प्रभाकरन के आदेश पर लिट्टे ने करवाई। हत्यारे पुट्ट अम्मान को सीधे संपर्क में थे।
इस जुर्म को अंजाम देने के काम पर 41 लोगों को लगाया गया। इनमें 14 भारतीय और अन्य श्रीलंकाई तमिल थे।
इन 41 लोगों में से 11-12 श्रीलंकाइयों ने जांच के दौरान ही सायनाइड खाकर खुदकुशी कर ली। 26 लोगों के खिलाफ मुकदमा चला और तीन को भगोड़ा करार दिया गया।
इन तीनों में प्रभाकरन, पुट्टू अम्मान और अखिला शामिल थे। अखिला लिट्टे के महिला प्रकोष्ठ की नेता थी जो 1995 में श्रीलंका सेना के हाथों मारी गई।
सोमवार को श्रीलंकाई सेना के हाथों प्रभाकरन और पुट्ट अम्मान के मारे जाने के बाद राजीव हत्याकांड से जुड़े दो आखिरी संदिग्धों का भी अंत हो गया जो भी पकड़े ही नहीं जा सके।
यह मुकदमा चेन्नई के निकट कांचीपुरम के पूनमाल्ली में टाडा अदालत में लंबित है।
सीबीआई के सूत्रों के अनुसार, प्रभाकरन और पुट्ट अम्मान की मौत का सबूत मिलने पर उसे अदालत में पेश किया जाएगा और इसके बाद मुकदमे की सुनवाई समाप्त हो जाएगी।
गांधी ने 1987 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजी थी। सीबीआई ने राजीव हत्याकांड का मुकदमा 24 मई 1991 को दर्ज कर जांच शुरू कर दी थी। 20मई 1992 को आरोप पत्र दाखिल किया गया और मुकदमे की सुनवाई 19 जनवरी 1994 को शुरु हुई।
5 जून 1995 को भारत श्रीलंका से प्रभाकरन और पुट्ट अम्मान को प्रत्यर्पित करने का औपचारिक अनुरोध किया।
28 जनवरी 1998 को अदालत ने सभी आरोपियों को सजा-ए मौत सुनाई। सिर्फ प्रभाकरन, पुट्ट अम्मान और अखिला ने मुकदमे का सामना नहीं किया।
1999 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदलते हुए इस मामले में सिर्फ चार को मृत्युदंड और तीन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अन्य को जेल में बिताए समय की वजह से रिहा कर दिया गया।
राजीव हत्याकांड की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारी आज भी उन दिनों को याद करते हैं। एक अधिकारी ने बताया, "हमने दौड़कर, मोटरसाइकिलों से, कारों से और तो और हेलीकाप्टरों से उनका पीछा किया। ऐसे दिन भी आए जब हमने सड़कों के किनारे कारों में सोकर रात बिताई। एक बार तो मैं लगातार 12 रातों तक सो नहीं पाया। आखिर में जो हमने हासिल किया,उसे देखकर लिट्टे विद्रोही भौंचक्के रह गए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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