तमिलों की स्वशासन की मांग की अनदेखी न करे श्रीलंका: सॉल्हेम
नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)। श्रीलंका में वर्ष 2002 की शांति प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने वाले नार्वे के मंत्री एरिक सॉल्हेम ने महिंदा राजपक्षे सरकार से उदार रुख अपनाने और स्वायत्तता की तमिलों की मांग को लिट्टे के खात्मे और उसके प्रमुख के मारे जाने की वजह से नजरअंदाज नहीं करने का अनुरोध किया है।
लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे)प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन के मारे जाने के कुछ घंटे बाद सॉल्हेम ने ओस्लो से टेलीफोन पर दिए साक्षात्कार में कहा, "श्रीलंका सरकार ने परंपरागत लड़ाई जीत ली है लेकिन वह शांति बहाली से कोसों दूर है।"
प्रभाकरन के साथ ही उसका पुत्र एवं लिट्टे के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का मुखिया चार्ल्स एंटनी, संगठन का राजनीतिक प्रमुख बी. नदेसन, लिट्टे की खुफिया इकाई का प्रमुख पुट्टो अम्मान और समुद्री इकाई का प्रमुख सूसई भी मारे गए।
सॉल्हेम ने आईएएनएस को बताया, "अब यह श्रीलंका सरकार पर है कि वह उदारता दिखाए, पूर्वोत्तर में स्वशासन की पेशकश करे और तमिलों और सिंहलियों दोनों के साथ समान व्यवहार करने वाले राष्ट्र का निर्माण करे।"
सॉल्हेम ने कहा, "यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो तमिल महत्वाकांक्षाएं कोई नया आकार ले लेंगी।"
नार्वे के पर्यावरण एवं अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री सॉल्हेम ने शांति प्रक्रिया में प्रभाकरन को शामिल करने के लिए उससे 10 बार मुलाकात की थी और अतंत: कामयाब रहे थे।
आखिरकार श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच फरवरी 2002 को ऐतिहासिक संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर हुए जिसकी वजह से अभूतपूर्व शांति कायम हुई लेकिन महीनों बाद संघर्ष विराम टूट गया और नए सिरे लड़ाई छिड़ गई।
सॉल्हेम ने प्रभाकरन के बारे में बताया, "मैंने उससे किसी भी गैर-तमिल से ज्यादा बार भेंट की। वह शर्मिला और शांत था तथा अपनी बात को सशक्त ढंग से नहीं कहता था..वह काफी लंबे अर्से तक सशक्त और सफल सैन्य नेता था।"
सॉल्हेम के अनुसार, दिसंबर 2006 में लिट्टे के विचारक एंटॉन बालासिंहम की मौत से प्रभाकरन ने अपना कीमती साथी खो दिया जो उसका राजनीतिक मार्गदर्शन कर सकता था।
सॉल्हेम के अनुसार, "बालासिंहम के जाने के बाद वह सैन्य मामलों से हटकर कुछ सोचने की क्षमता खो बैठा। बालासिंहम ऐसा सलाहकार था जो प्रभाकरन के साथ बातचीत कर उसे अन्य दिशा में बढ़ने के लिए कह सकता था। बालासिंहम के बाद वह इस क्षमता से वंचित हो गया।"
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षो से लिट्टे की ओर से कोई राजनीतिक पहल नहीं की गई। सॉल्हेम ने कहा कि प्रभाकरन, उसके पुत्र और वरिष्ठ साथियों की मौत का आशय यह हरगिज नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अब श्रीलंका से हट जाए।
उन्होंने कहा, "बहुत जरूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय श्रीलंका पर ध्यान केंद्रित रखे। हमें श्रीलंका सरकार को साफ-साफ कहना होगा..नहीं तो समस्याएं लौट सकती हैं।"
उन्होंने कहा कि विश्व को बेघर हुए लाखों लोगों के कल्याण में रुचि दिखानी होगी।
यह पूछने पर श्रीलंकाई संघर्ष का समापन इतने हिंसक ढंग से हुआ है ऐसे में क्या नार्वे की मध्यस्थता में चली शांति प्रक्रिया बेकार थी? सॉल्हेम ने कहा, "नहीं, शांति प्रक्रिया उस समय श्रीलंका के बहुत से लोगों को स्वीकार्य थी। यदि उसे राजनीतिक नेता स्वीकार कर लेते तो बहुसंख्य लोग भी मंजूर कर लेते।"
यह पूछने पर कि प्रभाकरन की मौत के बारे में वह क्या महसूस करते हैं? सॉल्हेम ने अपनी निजी भावनाओं का इजहार करने से इंकार कर दिया लेकिन कहा, "युद्ध में सिहंली और तमिल दोनों पक्षों के युवाओं के मारे जाने .. बेवजह के रक्तपात का उन्हें बेहद दुख है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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