पहेली बनी रही प्रभाकरण की ज़िंदगी

तमिल विद्रोही नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण की ज़िंदगी की पहेली बनी रही. उनकी पहचान एक निर्भीक छापामार लड़ाके के रुप में थी. ख़ुद एलटीटीई की वर्दी में असलहों से लैस रहने वाले प्रभाकरण तमिल विद्रोहियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए.
प्रभाकरण का जीवन
अपने साथी लड़ाकों के बीच वह इस क़दर लोकप्रिय और सर्वमान्य थे कि उनके एक इशारे पर कोई भी विद्रोही अपनी जान गँवा कर भी हमला करने के लिए तैयार रहता था.
पिछले तीन दशकों से एलटीटीई हमेशा श्रीलंका सेना के लिए ख़तरा बना रहा और पूर्वेत्तर इलाक़े के एक बड़े भू-भाग पर उसका नियंत्रण था. लेकिन पिछले एक वर्षों के दौरान सेना ने उस पर शिकंजा कसा और तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के विपरीत सेना की कार्रवाई जारी रही.
सेना ने वर्ष 2007 में ही विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले पूर्वी द्वीप पर नियंत्रण बना लिया और इस वर्ष के शुरू में एलटीटीई के गढ़ किलिनोच्ची और मुलाईतिवू पर भी सेना का क़ब्ज़ा हो गया. इसके बाद तमिल छापामार एक छोटे से इलाक़े में फँस गए थे.
साइनाइड कैप्सूल
प्रभाकरण के साथ-साथ लगभग सभी तमिल विद्रोही अपने साथ जानलेवा साइनाइड कैप्सूल रखते थे. सेना के साथ लड़ते-लड़ते अगर हार का मुँह देखना पड़े तो उन्हें ये कैप्सूल निगल लेने का निर्देश रहता है.
प्रभाकरण की प्रेरणा पर बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी हथियार उठाए. प्रभाकरण की अगुआई में जो विद्रोही लड़ाके थे उनमें बच्चों से लेकर महिलाओं की भारी तादाद थी. प्रभाकरण ख़ुद वार्ता की मेज़ पर बात करने की बज़ाए युद्धक्षेत्र में होना पसंद करते थे.
शायद इसीलिए जब नॉर्वे की मध्यस्थता में वर्ष 2002 में संघर्ष विराम हुआ तो इसका उपयोग प्रभाकरण ने अपनी सेना को फिर संगठित करने के लिए किया.
लेकिन ये संघर्ष विराम टिकाऊ साबित नहीं हुआ और वर्ष 2003 से वर्ष 2008 के बीच प्रभाकरण को कई झटके लगे. वर्ष 2004 में कभी प्रभाकरण का दाहिना हाथ माने जाने वाले कर्नल करुणा उनसे अलग हो गए.
दो साल बाद एलटीटीई की राजनीतिक शाखा के प्रमुख एंटन बालासिंघम की लंदन में मृत्यु हो गई. वो कैंसर से पीड़ित थे. नवंबर 2007 में सेना की बमबारी में वरिष्ठ तमिल विद्रोही नेता एसपी तमिलचेल्वम मारे गए.
हत्या के आरोप
तमिलों का एक बड़ा तबका प्रभाकरण को स्वतंत्रता सेनानी मानता था जो बहुसंख्यक सिंहला शासन के 'अत्याचारों" के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा था. दूसरी ओर श्रीलंका सरकार और सेना उन्हें एक क्रूर हत्यारा मानती थी, जिसके लिए मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं था.
प्रभाकरण शायद ही कभी सार्वजनिक जगहों पर देखे गए. घने जंगलों के बीच आशियाना बदलते रहने वाले तमिल नेता पर कई बार जानलेवा हमले हुए लेकिन वो बचते रहे.
शुरुआती जीवन
प्रभाकरण का जन्म 26 नवंबर 1954 को समुद्रतटीय शहर वेलवेत्तिथुरई में हुआ था. वो अपने माता पिता की चौथी और सबसे छोटी संतान थे. पढ़ाई में उन्हें औसत दर्जे का माना जाता था. बचपन में उनका स्वभाव शर्मीला और किताबों से चिपके रहने वाले बच्चे के रुप में था.
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि नेपोलियन और एलेक्ज़ेंडर महान का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा. साथ ही वो सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह से भी प्रभावित थे. ये दोनों भारतीय नेता ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ हिंसक संघर्ष में विश्वास रखते थे.
राजनीति, रोज़गार और शिक्षा में तमिलों के साथ भेद-भाव से आहत प्रभाकरण ने राजनीतिक बैठकों में हिस्सा लेना शुरु किया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण प्राप्त किया.
वर्ष 1975 में उन पर जाफ़ना के मेयर की हत्या का आरोप लगा. तमिल विद्रोहियों की ओर से ये पहली बड़ी कार्रवाई थी.


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