प्रभाकरणः एक हीरो, एक हत्यारा या और कुछ...

एक हिस्सा इस तरह से याद करेगा कि प्रभाकरण एक लड़ाई था जो किसी भी तरह से झुकने को तैयार नहीं था. जो राजनीति और कुर्सी के पीछे नहीं भागा.
जिसने कहा कि मैं तमिलों के हित के लिए लड़ूंगा और लड़ता रहा. उसने कहा कि मैं यहां से और अपनी लड़ाई से कभी भागुंगा नहीं. ज़रूरत पड़ी तो जान दे दूंगा. वो नहीं भागा और लड़ते लड़ते मरा.
ऐसे लोग भी होंगे जो सोचेंगे कि ये हमारा खुदा है, हमारा आदर्श है, हमारा हीरो है.
दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो कहेंगे कि इससे तमिलों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ. लगभग तीन दशकों की लड़ाई के दौरान हज़ारों लोग मारे गए पर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि तमिलों को इस लड़ाई से कुछ हासिल हुआ है.
यह आदमी अगर कुछ था तो एक ख़ूनी था. एक बेरहम हत्यारा था. एक ऐसा सनकी था जिसने अपने दिमाग़ में तय कर लिया था कि अगर मेरे ख़िलाफ़ कोई भी कुछ भी बोलेगा तो उसे मारने का मुझे पूरा अधिकार है.
संघर्ष का दौर
मुझे प्रभाकरण का वो दौर भी याद है जब वो बोट में चोरी-झिपे मद्रास आता था. मद्रास में रुकता था. वो बहुत ग़रीबी और तकलीफ़ का दौर था.
तीन दशक तक चला एलटीटीई का संघर्ष
कई बार प्रभाकरण को भूखा सोना पड़ता था क्योंकि उनके पास खाना खाने के पैसे नहीं होते थे. कई बार तो ये लोग नींद की गोली खाकर रात काट देते थे ताकि गोलियों के असर से भूख न लगे.
ये वो दौर था जब एलटीटीई का नाम किसी ने सुना ही होगा. इनकी एक ख़ास बात थी कि जितने भी पैसे होते थे, उसे ये लोग आपस में बाँट के खाते थे.
प्रभाकरण की ख़ास बात यह थी कि अगर इनके कोई दोस्त या साथी बीमार पड़ गए तो उसका पूरा ख़्याल रखा जाता था. वो इस बात का भी ख़्याल रखते थे कि चाहे खुद भूखा सोना पड़े, पर जो बीमार है, उसे अच्छा और ठीकठाक खाना खिलाया जाए.
यह वो समय था जब प्रभाकरण एक बेहद मासूम, सीधे-सादे आदमी थे.
प्रभाकरणः दूसरा पहलू
पर एक प्रभाकरण इसके बाद का है. जैसे जैसे संघर्ष आगे बढ़ता गया, इनके चरित्र, सोच और व्यक्तित्व में बदलाव आता गया.
प्रभाकरण ने शून्य से शुरुआत की थी
एक उदाहरण याद आता है कि प्रभाकरण के जो निजी अंगरक्षक होते थे, उनमें एक बार ऐसा हुआ कि एक महिला और एक पुरुष अंगरक्षक को जब रात के वक़्त इनकी रक्षा करनी थी, उस वक़्त उन दोनों ने आपस में शारीरिक संबंध बनाए.
इन दोनों के शारीरिक संबंध से अंगरक्षक महिला गर्भवती भी हो गई.
जब प्रभाकरण को इस बात का पता चला. एलटीटीई ने दोनों को पकड़ कर प्रभाकरण के सामने पेश किया. इस तरह की अनुशासनहीनता के लिए एलटीटीई में सज़ा मौत थी.
दोनों ने प्रभाकरण से अपनी ग़लती के लिए माफ़ी भी मांगी पर उन्हें माफ़ी नहीं मिली. कहा गया कि एलटीटीई में जो नियम और अनुशासन तोड़ता है, उसे मौत मिलती है और फिर दोनों को गोली से उड़ा दिया गया.
मामूली व्यक्तित्व नहीं
प्रभाकरण की ज़िंदगी दरअसल कुछ हटकर ही है. इसका यह कतई मतलब नहीं है कि आप इनके समर्थक हैं या हमदर्द हैं.
एलटीटीई के दिल और दिमाग थे प्रभाकरण
सवाल यह है कि जब कोई आदमी अपने घर से भागता है, वो भी तब जब उसकी उम्र महज 20-21 साल की है. उसके पास कुछ भी नहीं है. बस वो कपड़े हैं जिन्हें वो पहनकर निकला है. उसके पास एक चाकू तक नहीं है. वो सबसे पहले जो हथियार ख़रीदता है वो एक सैकेंडहैंड पिस्तौल है.
उसके बाद उसने एक एक ईंट जोड़-जोड़कर एलटीटीई को बनाया. वो समय था जब इसके पास पैसे नहीं थे, कोई साधन नहीं था. पुलिस पीछा करे तो छिपने की जगह तक नहीं थी.
वर्ष 1983 में उन्होंने जाफ़ना में एक हमला किया और 13 सैनिकों को मार दिया. उस वक़्त उनके पास महज 40 लोग थे और कुछ 20-25 हथियार थे. यह बात है जुलाई महीने की.
इसी एलटीटीई की छोटी सी टीम ने इस हमले के चार साल बाद अक्टूबर, 1987 में हिंदुस्तानी सेना के ख़िलाफ़ मोर्चा लिया, उनपर हमला बोला. यह कोई मामूली बात नहीं है कि केवल चार साल में आप एक गुब्बारे की तरह फैलते जाते हैं. बढ़ते जाते हैं.
इसके तीन साल बाद यानी 1990 में इन्होंने उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया. एक समय ऐसा भी आया जब श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने कहा था कि एलटीटीई ने एक तिहाई ज़मीनी क्षेत्र और दो तिहाई तटीय क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है.
ज़रा सोचिए, कि जो व्यक्ति 1972 में अपने घर से एक जोड़ी कपड़ों में भागा, वो 1990 तक इतनी ताकत हासिल कर लेता है. मैं यह नहीं कह रहा कि उसने ठीक किया पर सोचिए तो पता चलता है कि यह एक अदभुत चीज़ है.
कैसे बनी ताक़त
प्रभाकरण ने एक मज़बूत और आधुनिक तैयारियों के साथ लड़ाई की
एक और बात याद आती है. यह उस वक़्त की बात है जब वो तमिलनाडु में रहते थे.
उस वक़्त उन्होंने अपने मन में एक फ़ैसला लिया था कि भारत सरकार आज हमारी मदद ज़रूर कर रही है पर ऐसा ज़रूरी नहीं है कि भारत सरकार आगे भी हमारी मदद करती रहेगी.
उन्होंने तय किया कि हम किसी के चंगुल में नहीं फँसेंगे और ऐसा नहीं सोचेंगे कि हम जब तक लड़ेंगे तब तक भारत सरकार हमारा साथ देगी.
इन्होंने इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर 1984 से अपना स्वतंत्र रूप से संगठन खड़ा करने का काम किया. हथियार ख़रीदे. धीरे-धीरे जहाज़ और विमान तक जुटाए. दुनिया में यह तीसरा इस तरह का संगठन था जिसके पास समुद्री सामरिक तैयारी थी.
तमिल मूल के लोगों से भावनात्मक स्तर पर इन्होंने पैसा जुटाया. पर ऐसा नहीं है कि केवल संवेदना या भावना के स्तर पर पैसा जुटाने का काम हुआ. इन्होंने और भी तरीके अपनाए.
ऐसा नहीं था कि इन्हें पैसे देने वाले सभी लोग खुश थे. इनका चरित्र ऐसा बन गया था कि लोगों को लगता था कि इनसे पंगा लेना बेकार है और इसलिए जब ये पैसे माँगते थे तो बाहर के देशों में रहने वाले तमिल तक इनको पैसा दे देते थे.
प्रभाकरण के बाद क्या
प्रभाकरण के बाद है एक शून्य.
ऐसा कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रभाकरण के बाद भी 'गोरिल्ला वार' चल सकता है. लड़ाई आगे जा सकती है. ऐसा असंभव तो नहीं पर बहुत-बहुत-बहुत ही मुश्किल है.
संगठन के रूप में एलटीटीई अब पूरी तरह से ख़त्म है. किसी भी लड़ाई के लिए आपको एक संगठन चाहिए. श्रीलंका सेना ने एलटीटीई को इस तरह से ख़त्म किया है जैसे कोई किसी गेंद को पकड़कर इस तरह मसल दे कि उसे फिर से न बनाया जा सके.
इस संगठन को सलाह देने वाला, चलाने वाला, इसका दिल, इसका दिमाग़... सबकुछ एक ही था और वो था प्रभाकरण.
जब वो नहीं रहा तो फिर एलटीटीई का क्या सवाल है. एलटीटीई अब ज़ीरो है.
(लेखक नारायणस्वामी, प्रभाकरण के जीवन पर चर्चित पुस्तक ‘इनसाइड एन इल्यूसिव माइंड’ के लेखक हैं. यह लेख उनकी बीबीसी से बातचीत पर आधारित है)


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