एलटीटीईः अस्तित्व से अंत तक

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वर्ष 1971 –सीलोन (आज के श्रीलंका) में सिंहली मार्क्सवादी विद्रोह हुआ जिसमें छात्रों और वामपंथी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. वर्ष 1972 - सीलोन ने अपना नाम बदलकर श्रीलंका किया और बौद्ध धर्म को देश में प्रमुख स्थान मिला. इससे तमिल संप्रदाय की नाराज़गी बढ़ी.

वर्ष 1976 - श्रीलंका का उत्तर और पूर्वी हिस्सा तमिल बाहुल्य. वहाँ तनाव बढ़ता गया. इसी तनाव और विरोध की पृष्ठभूमि में तमिलों के विद्रोही संगठन, लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) का गठन हुआ. वर्ष 1977 - पृथकतावादी तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (टीयूएलएफ़) ने तमिल बाहुल्य क्षेत्रों में सभी सीटें जीतीं.

वर्ष 1983 - एलटीटीई के घात लगाकर किए गए हमले में 13 सैनिक मारे गए. इसके बाद तमिल विरोधी दंगे भड़क उठे जिनमें सैकड़ों लोगों की मौत हो गई. श्रीलंका के उत्तरी क्षेत्र में तमिलों और सरकारी सेना के बीच लड़ाई तेज़ हो गई.

गृहयुद्ध की गंभीरता

वर्ष 1985- सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच शांति वार्ता की पहली कोशिश नाकाम हो गई.वर्ष 1987 - सरकारी सेनाओं ने उत्तरी शहर जाफ़ना में तमिल विद्रोहियों को और पीछे हटा दिया. सरकार ने एक ऐसे समझौते पर दस्तख़त किए जिनके तहत तमिल बाहुल्य इलाक़ों में नई परिषदों का गठन किया जाना था. भारत के साथ भी समझौता हुआ जिसके तहत वहाँ भारत की शांति सेना की तैनाती हुई.

वर्ष 1988 - वामपंथी धड़े और सिंहलों की राष्ट्रवादी पार्टी, जनता विमुक्ति पैरामुना (जेवीपी) ने भारत-श्रीलंका समझौते के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया. वर्ष 1990 - उत्तरी क्षेत्र में काफ़ी लड़ाई को देखते हुए भारतीय सेना ने देश छोड़ दिया. श्रीलंका की सेना और पृथकतावादी तमिल विद्रोहियों के बीच हिंसा और बढ़ गई.

राजीव गांधी की हत्या

वर्ष 1991 - भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तमिलनाडु राज्य में एक आत्मघाती हमले में मौत हो जाती है जिसके लिए तमिल विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया. शांति सेना भेजने की क़ीमत भारत ने अपना एक नेता खोकर चुकाई वर्ष 1993 - राष्ट्रपति प्रेमदासा एक बम हमले में मारे गए जिसके बारे में कहा गया कि यह तमिल विद्रोहियों ने किया.

वर्ष 1994 - राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा युद्ध समाप्त करने के वादे के साथ सत्ता में आती हैं. तमिल विद्रोहियों के साथ शांति वार्ता शुरू होती है. वर्ष 1995 - शांति वार्ता नाकाम हो गई और तमिल विद्रोहियों ने बम हमले शुरू कर दिए. श्रीलंका सेना ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक बड़ा अभियान चलाते हुए उन्हें जाफ़ना से बाहर निकाल दिया.

वर्ष 1996 - आपातकाल पूरे देश तक बढ़ा दिया गया. उधर तमिल विद्रोहियों ने राजधानी कोलंबो में भी बम हमले किए.वर्ष 1997 - सरकार ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक और बड़ा अभियान शुरू किया. वर्ष 1998 - तमिल विद्रोहियों ने श्रीलंका के सबसे पवित्र बौद्ध स्थल को निशाना बनाया. भीषण लड़ाई के बाद तमिल विद्रोहियों ने उत्तरी क्षेत्र में कुछ प्रमुख शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया. वर्ष 1999 - राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा एक चुनावी रैली में हुए बम धमाके में घायल हो गईं. वे फिर से राष्ट्रपति चुनी गईं.

शांति के अंतरराष्ट्रीय प्रयास

वर्ष 2000 - फ़रवरी में नॉर्वे ने कहा कि वह श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाना चाहता है.इसी वर्ष अप्रैल में तमिल विद्रोहियों ने उत्तरी द्वीप में सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण एलीफ़ेंट पास पर क़ब्ज़ा कर लिया.इसी वर्ष अक्टूबर में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के पीपुल्स अलायंस ने आम चुनावों में जीत हासिल की.

वर्ष 2001 - फ़रवरी में ब्रिटेन ने नए आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई को 'आतंकवादी संगठन" घोषित किया.वर्ष 2001 - जुलाई में तमिल विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमला किया.इसी वर्ष अक्टूबर में चंद्रिका कुमारतुंगा ने अपनी सरकार बचाने के लिए अविश्वास मत से कुछ ही घंटे पहले संसद को भंग कर दिया. उनकी सरकार को मार्क्सवादियों का समर्थन था. नए चुनाव पाँच दिसंबर को कराने की घोषणा की गई.

इसी वर्ष दिसंबर में चुनावों के बाद प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी. उनकी यूनाइटेड नेशनल पार्टी ने मामूली बहुमत से संसदीय चुनाव जीता.

शांति वार्ता

वर्ष 2002 - सरकार और तमिल विद्रोहियों ने स्थाई युद्धविराम समझौते पर दस्तख़त किए जिससे इस लंबे हिसंक संघर्ष को समाप्त करने का कुछ रास्ता निकला. शांति वार्ता में मध्यस्थता नॉर्व ने शुरू की. दोनों ओर से लड़ाई में कई हज़ार लोग मारे जा चुके हैं

वर्ष 2002(मार्च-मई) - हथियार छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई. जाफ़ना को श्रीलंका के बाक़ी हिस्से से जोड़ने वाली सड़क 12 वर्ष बाद खुली. जाफ़ना के लिए यात्री विमानों की उड़ान भी शुरू हुई.वर्ष 2002 – सितंबर में सरकार ने तमिल विद्रोहियों पर से प्रतिबंध हटा लिया जो उनकी लंबे समय से माँग रही थी. पहले दौर की बातचीत थाईलैंड में शुरू हुई. दोनों पक्षों ने पहली बार युद्ध क़ैदियों की अदला-बदली की. तमिल विद्रोहियों ने अलग देश की माँग छोड़ दी.

वर्ष 2002 – दिसंबर में नॉर्व में हुई शांति वार्ता में दोनों पक्ष सत्ता बँटवारे पर सहमत हुए. इस समझौते के तहत अल्पसंख्यक तमिलों को मुख्य रूप से तमिलभाषी - पूर्वोत्तर क्षेत्रों में स्वायत्तता देने की बात हुई.वर्ष 2003 - फ़रवरी में शांति वार्ता का अगला दौर बर्लिन में संपन्न हुआ. वर्ष 2003 - अप्रैल में तमिल विद्रोहियों ने शांति वार्ता से यह कहते हुए हाथ खींच लिया कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

राजनीतिक संकट

वर्ष 2003 - नवंबर में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने तीन मंत्रियों को बर्ख़ास्त किया और संसद स्थगित कर दी. शांति वार्ता को लेकर सरकार के साथ उनकी अनबन चल रही थी. एक पखवाड़े के बाद संसद बहाल कर दी गई लेकिन तमिल विद्रोहियों के साथ बातचीत स्थगित कर दी गई.

वर्ष 2004 – मार्च में विद्रोही तमिल नेता करुणा ने अलग होकर अपना अलग धड़ा बना लिया और अपने समर्थकों के साथ भूमिगत हो गया. वर्ष 2004 – अप्रैल में राजनीतिक खींचतान के बीच समय से पहले आम चुनाव कराए गए. कुमारतुंगा की पार्टी को 225 में 105 सीटें मिलीं जो सरकार बनाने के लिए काफ़ी नहीं थीं. महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

वर्ष 2004 - जुलाई - कोलंबो में एक आत्मघाती हमला हुआ जो 2001 के बाद से इस तरह का बड़ा हमला था. इससे शांति वार्ता के औचित्य पर सवाल खड़े हो गए. वर्ष 2004 - दिसंबर में सुनामी के कहर ने 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की जान ले ली. लाखों लोग बेघर भी हो गए. श्रीलंका में राष्ट्रीय आपदा घोषित की गई.वर्ष 2005 – जून में तमिल बाहुल्य इलाक़ों में भी सूनामी प्रभावितों तक सहायता पहुँचाने के लिए समझौता हुआ.वर्ष 2005 – अगस्त में विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमर की हत्या के बाद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई.

बिखर गईं कोशिशें

वर्ष 2005 – नवंबर में प्रधानमंत्री महिंद्रा राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद के लिए हुआ चुनाव जीता.इस चुनाव में तमिल विद्रोहियों के नियंत्रण वाले बहुत से इलाक़ों में लोगों ने मतदान में हिस्सा ही नहीं लिया.वर्ष 2006 – फ़रवरी में सरकार और तमिल विद्रोहियों ने जेनेवा में हुई शांति बातचीत में उस युद्धविराम समझौते के लिए अपना सम्मान फिर से व्यक्त किया जो 2002 में हुआ था.

वर्ष 2006 – अप्रैल में पूर्वोत्तर में तमिल बाहुल्य शहर ट्रिंकोमाली में विस्फोट हुए जिनके बाद दंगे भी फैले जिनमें 16 लोगों की मौत हो गई. पुलिस ने उन विस्फोटों के लिए तमिल विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया.प्रभाकरन के अंत के साथ श्रीलंका में तमिलों की स्वायत्तता की लड़ाई और तीन दशक से भी ज़्यादा चले संघर्ष के एक अध्याय का अंत हो गया

कोलंबो में मुख्य सैन्य परिसर में एक आत्मघाती हमला हुआ जिसमें आठ लोग मारे गए. श्रीलंका की सेना ने उसके बाद तमिल विद्रोहियों के ठिकानों को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए.वर्ष 2007- श्रीलंका की पुलिस ने सैकड़ों की तादाद में तमिल नागरिकों को राजधानी कोलंबो से बाहर निकाल दिया. इसके पीछे सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया गया. हालांकि न्यायालय ने इसे ग़लत क़रार दिया.

अंत की शुरुआत

वर्ष 2008- श्रीलंका सरकार ने 2002 के शांति समझौते को बेमानी बताते हुए इससे अपने हाथ खींच लिए.वर्ष 2008- मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से घिरी श्रीलंका सरकार. अंतरराष्ट्रीय पैनलों ने भी भर्त्सना की.वर्ष 2008- जुलाई में सरकार ने दावा किया कि उन्होंने तमिल विद्रोहियों के देश के उत्तर में स्थित नौसेना बेस पर कब्ज़ा कर लिया है.

इसी वर्ष अक्टूबर में हुए आत्मघाती हमलों में एक पूर्व जनरल समेत 27 लोग मारे गए. इसका भी आरोप एलटीटीई पर लगा.यहाँ से खुली लड़ाई की बात शुरू हो गई. श्रीलंका की सेना और एलटीटीई की ओर से एक दूसरे के लोगों को मारने की दावेदारियाँ शुरू हो गईं. वर्ष 2009- जनवरी में 10 वर्षों से एलटीटीई के कब्ज़े में रहे किलिनोच्चि शहर पर अपना कब्ज़ा कर लिया. यह शहर एलटीटीई का प्रशासनिक मुख्यालय था. राष्ट्रपति ने तमिल विर्दोहियों से समर्पण करने को कहा.

वर्ष 2009- फ़रवरी में दुनियाभर से श्रीलंका में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर चिंता व्यक्त की जाने लगी. युद्धक्षेत्र में फंसे हज़ारों-लाखों लोगों को लेकर विश्व समुदाय ने मांग की कि अल्पकालिक संघर्षविराम घोषित हो.श्रीलंका की सरकार ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया. तमिल विद्रोहियों को फिर से समर्पण करने को कहा. पर एलटीटीई ने कोलंबो पर हवाई हमले किए.

वर्ष 2009 मार्च- एलटीटीई से अलग हुए विद्रोही नेता करुणा को मंत्रिमंडल में जगह मिली. एलटीटीई के एक वरिष्ठ नेता थामिलेंथी मारे गए.संयुक्त राष्ट्र ने दोनों पक्षों की युद्ध अपराधों के लिए भर्त्सना की. अप्रैल और मई में सेना का अभियान अपने चरम पर पहुँच गया. एलटीटीई का दायरा लगातार घटता गया.

एक छोटे से इलाके में सिमटे तमिल विद्रोहियों के बीच फंसे हज़ारों लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का मुद्दा उठता रहा. हज़ारों लोग खुद युद्ध क्षेत्र में भागकर बाहर आए. सैकड़ों मारे गए. तमिल विद्रोहियों ने दो बार संघर्ष विराम घोषित किया पर सेना का अभियान जारी रहा.18 मई, 2009 को प्रभाकरन की मौत की ख़बर के साथ एलटीटीई के अस्तित्व का अंत मान लिया गया.

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