प्रभाकरणः उत्थान और पतन

श्रीलंका में तमिल समस्या
श्रीलंका की तमिल समस्या कोई हवा में पैदा हो गई हो, ऐसा नहीं है। यह माना जाता है कि उसके उद्भव में सिंहली प्रभुत्ववाद और तमिलों की लंबी उपेक्षा और पक्षपात की पृष्ठभूमि है। चूंकि तमिल मूल रूप से भारतीय मूल के लोग हैं, इसलिए उनकी तकलीफों के प्रति भारत में स्वाभाविक चिंता रही है। यही वजह थी कि ढाई दशक पहले, इंदिरा गाधी के निधन के बाद, भारत ने जब दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय महाशक्ति की भूमिका निभानी शुरू की तो तमिलों के दु:खदर्द की ओर उसका ध्यान गया। उसने तमिलों के हितैषी के रूप में श्रीलंका में अपनी भूमिका निभानी शुरू की और प्रभाकरण तथा उनके संगठन को राजनीतिक, कूटनीतिक और सामरिक समर्थन भी दिया। हालाकि भारत ने अलग तमिल ईलम की स्थापना का कभी भी समर्थन नहीं किया, लेकिन वह तमिलों को उनके जायज हक दिलाने के लिए प्रतिबद्ध था।
लिट्टे का गठन और अन्य विद्रोही संगठन
जिस वक्त प्रभाकरण ने इसका गठन किया तो इस संस्था के सदस्य छोटे-छोटे अधिकारियों पर हमला करते थे, जैसे पुलिसकर्मियों या छोटे नेताओं पर । जाफ़ना के मेयर (महापौर) अल्फ्रेड डुरैयप्पा की हत्या उस समय उनके द्वारा अंजाम दी जाने वाली पहली बड़ी वारदात थी । 1984 में लिट्टे ने एक उग्रवादी मोर्चे की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की जिसके अन्य सदस्य भी तमिळ उग्रवादी समूह थे - तमिळ ईलम लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (अंग्रेज़ी में संक्षेप - टेलो), ईलम रेवॉल्यूशनरी ऑर्गेनाईजेशन ऑफ़ स्टूडेन्ट्स (छात्रों का स्वदेशी क्रांतिकारी संगठन, अंग्रेजी में संक्षेप - इरोस), पिपुल लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ तमिल ईलम (पी एल ओ टी ई) । इस मोर्चे का नाम रखा गया था - ईलम नेशनल लिबरेशन फ्रंट (स्वदेश मुक्ति मोर्चा) । लेकिन 1986 में लिट्टे इस मोर्चे से बाहर निकल गया और उसने एक एक करके अन्य सदस्य संगठनों पर अपना अघिपत्य जमाना चालू कर दिया ।
जाफना पर लिट्टे का दबदबा
सबसे पहले इसने टेलो, जो कि उस समय श्रीलंका का सबसे बड़ा उग्रवादी निगम था, के सदस्यों तथा प्रशिक्षण शिविरों पर सशस्त्र हमला शुरु किया । कुछ महीनों के भीतर ही टेलो के सभी बड़े नेता मारे या पकड़े गए और लिट्टे का प्रभुत्व स्थापित हो गया । इसके बाद इसने इपीआरएलएफ़ के सदस्यों पर हमला बोला जिससे उसे जाफ़ना प्रायद्वीप में अपनी गतिविधियां बंद करनी पड़ी । इसके बाद एलटीटीई ने सभी तमिल लड़ाकों को एलटीटीई में मिल जाने को कहा । उस समय श्रीलंका मे छोटे-बड़े 20 उग्रवादी संगठन कार्यरत थे, लगभग सभी ने लिट्टे की अधीनता या प्रभुत्व स्वीकार कर लिया । जाफना एक लिट्टे का दबदबा वाला शहर बन गया ।
भारत की दिक्कतें और हस्तक्षेप
तमिळ लोग, जिनका प्रमुख निवास स्थान दक्षिण भारत का तमिलनाडू राज्य है, इस संघर्ष से परेशान होकर भारत में शरणार्थियों के रूप में आने लगे । भारत और श्रीलंका की सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए । इसमें तमिल उग्रवादियों को शामिल नहीं किया गया था पर अधिकांश चरमपंथी संगठनों ने इस समझौते का अनुसरण करने का मन बना लिया था । इस समझौते के तहत उत्तरी इपीआरएलएफ़ के अधिकार वाले तमिळ प्रदेशों में एक हद तक स्वायत्तता दे दी गई और एक समिति का गठन किया गया जिसमें इआरपीएलएफ़ के तमिळ लोग शामिल थे।
बदलते हालात
प्रभाकरण ने करीब दो दशक से भी अधिक समय तक उत्तर-पूर्वी प्रात के अधिकाश भागों पर आधिपत्य जमाए रखा। मगर देखते-देखते श्रीलंका में पासा पलट गया। दो दशक से भी अधिक समय तक उत्तर-पूर्वी प्रात के अधिकाश भागों पर आधिपत्य जमाए रहने वाले प्रभाकरण और उनके साथियों के पास छिपने के लिए बस कुछ वर्ग किलोमीटर का इलाका रह गया। श्रीलंका सेना का शुरु से दावा था कि वह भी अधिक समय तक नहीं रहेगा। पांच-सात साल पहले तक इस स्थिति की कल्पना करना भी असंभव था।


Click it and Unblock the Notifications