भाजपा को अपने गढ़ मालवा में मिली मात

प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में मालवा अंचल की अहम भूमिका रही है। ऐसा माना जाता है कि जिस भी दल ने इस इलाके में बढ़त पाई है वह प्रदेश की राजनीति में ताकतवर हुआ है। पिछले लोकसभा चुनाव पर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि इस अंचल की आठ में से सात सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। इस बार भी भाजपा करिश्मा दोहराना चाहती थी।

भाजपा ने मालवा में इतिहास रचने के मकसद से पांच सांसदों को फिर चुनाव मैदान में उतारा। देवास से थावर चंद गहलोत, उज्जैन से सत्यनारायण जटिया, मंदसौर से डा. लक्ष्मी नारायण पान्डे, इन्दौर से सुमित्रा महाजन, खंडवा से नन्द कुमार चौहान चुनाव मैदान में थे।

इसके अलावा पार्टी ने रतलाम से दिलीप सिंह भूरिया, धार से मुकाम सिंह बघेल तथा खरगौन में माखन सिंह पर दांव लगाया। इनमें से सिर्फ इन्दौर से सुमित्रा महाजन और खरगौन से माखन सिंह सोलंकी ही भाजपा की लाज बचा सके है। पिछले सांसदों में तो सुमित्रा महाजन ही इकलौती ऐसी है जो जीत दर्ज करा पाई है।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने जिन आठ लोगों पर दाव लगाया था उनमें से देवास से सज्जन सिंह वर्मा, मंदसौर से मीनाक्षी नटराजन, उज्जैन से प्रेम चंद गुड्डू, धार से गजेन्द्र सिंह राजूखेड़ी, खंडवा से अरुण यादव और रतलाम से कान्तिलाल भूरिया ने जीत हासिल कर भाजपा के किले को नेस्तनाबूत कर दिया है।

मालवा अंचल में भाजपा विधानसभा चुनाव से ही गुटबाजी का शिकार रही है। यहां ताई सुमित्रा महाजन और भाई कैलाश विजयवर्गीय के बीच छिड़ी राजनैतिक अस्तित्व की लड़ाई ने पार्टी को पूरी तरह दो धड़ों में बांटकर रख दिया है। सुमित्रा महाजन मतदान होने के बाद से ही लगातार विजयवर्गीय पर हमले बोल रही थी और उन्होंने अपनी कम मतों से हुई जीत के लिए भी परोक्ष रूप से विजयवर्गीय पर ही निशाना साधा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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