जाटलैंड में रालोद ने उठाया भाजपा से गठजोड़ का पूरा फायदा

लखनऊ, 17 मई(आईएएनएस)। जाटलैंड यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से गठबंधन का भरपूर फायदा उठाया। रालोद ने खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने में कामयाबी पाते हुए 5 सीटों पर विजयी पताका फहराई।

रालोद इस चुनाव में भाजपा के साथ गठजोड़ करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सात सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से उसे हाथरस, बिजनौर, बागपत, मथुरा, और अमरोहा में सफलता मिली।

रालोद अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह अपनी हर सभा में यह सवाल करना नहीं भूलते थे कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के पास इतना बड़ा वोट बैंक है कि वह चुनाव जीत जाए। जब जवाब मिलता था-'नहीं' तो वह कहते थे कि फिर आपके पास विकल्प क्या है, सिर्फ और सिर्फ रालोद और भाजपा का गठबंधन क्योंकि रालोद के पास अपना इतना वोट है और भाजपा का वोट भी उसे मिल रहा है इस तरह बसपा से वही मुकाबला कर सकती है।

इसके अलावा किसान मतदाताओं के बीच भी रालोद यह बात पहुंचाने में कामयाब रही है कि बसपा का किसानों से कोई लेना देना नहीं है। मायावती तो सिर्फ एक खास जाति की राजनीति करती हैं। पिछले साल ग्रेटर नोएडा में पुलिस की गोली से मारे गए किसानों के मुद्दे ने आग में घी का काम किया।

रालोद के प्रदेश अध्यक्ष रामआसरे वर्मा ने आईएएनएस से कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों ने समझ लिया है कि रालोद ही बसपा का सबसे मजबूत विकल्प है और रालोद को ही किसानों की परवाह रहती है।

इसके अलावा गाजियाबाद से चुनाव लड़ रहे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जितनी सभाएं की उनमें वह यह कहना नहीं भूलते थे कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में रालोद के वोट उन्हें मिल रहे हैं। ऐसे में भाजपा के वोटरों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे लोकदल के पक्ष में वोट तो डाले ही, साथ ही उनका प्रचार भी करें।

वैसे मुजफ्फरनगर में अजीत सिंह की करीबी अनुराधा चौधरी की हार से पार्टी को एक झटका भी लगा है। रालोद ने किसी भी क्षेत्र में प्रचार के लिए भाजपा के फायर ब्रांड नेता नरेंद्र मोदी की मदद नहीं ली, लेकिन मुजफ्फरनगर में चुनाव को हिंदू-बनाम मुिस्लम का रूप देने के लिए मोदी से प्रचार कराया गया। मोदी के प्रचार करने से मुसलमान वोट पूरी तरह से लामबंद होकर बसपा की तरफ चला गया और अनुराधा चौधरी को हार का मुंह देखना पड़ा।

पार्टी के एक नेता के मुताबिक अगर यहां के चुनाव को हिंदू-बनाम मुस्लिम का रूप नहीं दिया गया होता तो अन्य क्षेत्रों की तरह मुस्लिम मतदाताओं का थोड़ा ही सही लेकिन रालोद को समर्थन जरूर मिलता।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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