साफ छवि, परंपरागत वोट बैंक की बदौलत जोशी की लोकसभा में वापसी
नई दिल्ली, 17 मई (आईएएनएस)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी देश के प्रमुख सांस्कृति नगरी वाराणसी से अपनी साफ छवि, भाजपा के परंपरागत वोट बेंक और कुछ हद तक ध्रुवीकरण के चलते आखिरकार वाराणसी की प्रतिष्ठित लोकसभा सीट से जीतने में कामयाब रहे हालाकि उनकी जीत का अंत बहुत ज्यादा नहीं रहा।
राष्ट्रीय राजनीति में कद्दावर छवि रखने वाले जोशी को आपराधिक छवि वाले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के मुख्तार अंसारी से कड़ी टक्कर मिली। जोशी ने 17,211 मतों से जीत हासिल की। जोशी को 2,03122 मत मिले जबकि मुख्तार 1,85,911 मत हासिल करने में सफल रहे।
भाजपा के पूर्व विधायक और इन चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थामने वाले अजय राय ने 1,23,874 मत बटोरे में सफलता हासिल की। 2004 में यहां से जीत चुके कांग्रेस के राजेश मिश्रा 66,386 मतों के साथ चौथे स्थान पर रहे।
समीकरण की बात करें तो राजेश मिश्रा ने मुस्लिम मतों में सेंध लगाकर मुख्तार का नुकसान किया और अजय राय ने स्थानीय होने के कारण जोशी के मत काटे लेकिन भाजपा का पुराना गढ़ होने के कारण जोशी को जीत हासिल करने में दिक्कत नहीं हुई। 12वें से 16वें चरण की मतगणना के दौरान जोशी और मुख्तार के बीच मतों का फासला 4000 तक पहुंच गया था लेकिन उसके बाद जोशी ने जो बढ़त हासिल की वह अंत तक बनी रही।
2004 के लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद में हार झेलने के बाद जोशी ने जीत की उम्मीद के साथ वाराणसी का रुख किया था। जोशी की जीत में उनकी साफ-सुथरी राजनीति छवि ने निश्चित तौर पर बड़ा योगदान दिया लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि जोशी को जीत सिर्फ इसलिए मिली क्योंकि वह एक ऐसे क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे, जो हमेशा से भाजपा के प्रत्याशियों लिए सुरक्षित रहा है।
2004 में राजेश मिश्रा ने मुस्लिम जनता का समर्थन पाकर जीत हासिल की थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि राजेश मिश्रा ने मुस्लिमों के बीच रहकर काफी काम किया था और उन्हें इसी का फायदा मिला था। 2004 में भाजपा को जीत इसलिए नहीं मिली थी क्योंकि उसने कोई कद्दावर प्रत्याशी नहीं खड़ा किया था लेकिन इस बार दोनों स्तरों पर स्थिति भाजपा के पक्ष में थी।
जोशी को मैदान में उतारकर ही भाजपा ने सांस्कृति रूप से धनी इस शहर में अपनी जीत पक्की कर ली थी। इसका कारण यह है कि जोशी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं और उनके पास केंद्रीय मंत्री और एक शिक्षाविद् के रूप में अपार अनुभव है। दूसरी ओर, अन्य पार्टियों ने जो उम्मीदवार खड़े किए थे वे जोशी के कद के आगे कहीं नहीं टिक पाए।
मुख्तार से जनता आतंकित रही है और राजेश ने पिछली बार की तरह इस बार भी मुस्लिम मत के बूते जीत चाही। अजय राय ने उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन भाजपा छोड़कर सपा का दामन थामने के कारण उन्हें भाजपा के पारंपरिक मत नहीं मिले। इसके बावजूद अजय एक लाख से अधिक मत बटोरने में सफल रहे।
वाराणसी के करीब से जानने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के रीडर मनोज कुमार सिंह का मानना है कि जोशी ने बिना किसी लहर के चुनाव जीता है। वाराणसी से टिकट मिलने के बाद जोशी ने यहां आकर भाजपा के उन पुराने स्थानीय दिग्गजों को अपने साथ किया और सटीक रणनीति के साथ प्रचार शुरू किया।
सिंह कहते हैं, "जोशी को भाजपा का वरिष्ठ नेता होने का फायदा मिला क्योंकि अगर भाजपा किसी कम लोकप्रिय प्रत्याशी को यहां से टिकट देती तो उसका जीतना मुश्किल था। इसका कारण यह है कि हमेशा से भाजपा के समर्थन में खड़े रहने वाले लोग अपने यहां से किसी दिग्गज को जीतते देखना चाहते थे। इसके अलावा आज लोग क्षेत्रीय पार्टियों की जगह एक बार फिर राष्ट्रीय पार्टियों की ओर रुख करने लगे हैं क्योंकि वे समझने लगे हैं कि राष्ट्रीय पार्टियां ही उनके विकास के बारे मे सोच सकती हैं। लोग क्षेत्रीय पार्टियों की मौकापरस्ती और जोड़-तोड़ की राजनीति से तंग आ चुके हैं।"
तीन पीढ़ियों से वाराणसी में रह रहे लंका क्षेत्र के थोक दवा व्यवसायी पवन कुमार का मानना है कि इस बार सीधे-सीधे हिंदू और मुसलमान प्रत्याशियों के बीच टक्कर थी। पवन कहते हैं, "मुस्लिम जनता ने मुख्तार को बसपा या किसी अन्य पार्टी का नेता होने के कारण नहीं बल्कि एक मुसलमान होने के कारण वोट दिया जबकि जोशी को प्रखर हिंदूवादी नेता होने का फायदा मिला। अजय राय ने भी हिंदुओं, खासकर भाजपा के पारंपरिक मत काटे। अगर ऐसा नहीं होता तो जोशी बहुत बड़े अंतर से जीतते।"
वाराणसी जिला न्यायालय के वकील और बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरि शंकर सिंह का मानना है कि जोशी भाग्यशाली हैं कि उन्हें भाजपा ने वाराणसी से टिकट दिया क्योंकि यह शहर भाजपा का पुराना गढ़ रहा है और इस लिहाज से टिकट मिलने के साथ ही जोशी जैसे दिग्गज की जीत पक्की मानी जा रही थी। सिंह ने कहा, "जोशी को व्यक्तिगत तौर पर नहीं बल्कि भाजपा का नेता होने के कारण जीत मिली है। वैसे जहां तक शिक्षाविद् बनाम माफिया का सवाल है तो इसका भी उन्हें फायदा मिला है क्योंकि स्थानीय लोग, खासतौर पर हिंदू मुख्तार जैसे 'अपराधी' को अपना प्रतिनिधि बनाने से कतरा रहे थे।"
पिछले 20 वर्षो से वाराणसी में निवास कर रहीं गृहणी रेखा पांडेय मानती हैं जोशी महिला मतदाताओं के बीच अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण लोकप्रिय हैं और इसका उन्हें सीधा फायदा मिला है। रेखा कहती हैं, "मैं राजनेता के तौर पर जोशी को बहुत अच्छी तरह नहीं जानती लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रीय स्तर का नेता होने के साथ-साथ भाजपा का प्रत्याशी होने का उन्हें फायदा मिला। राजेश कुमार का काम लोग देख चुके थे। उनसे शहर की हिंदू जनता नाराज थी क्योंकि वह मुस्लिमों के प्रति ज्यादा समर्पित दिखते हैं। जहां तक मुख्तार की बात है तो वह भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने पहुंचे थे लेकिन खराब छवि ने उन्हें हरा दिया। पुरुषों की सोच अलग हो सकती है लेकिन महिला मतदाता किसी भी सूरत में किसी माफिया को अपना जनप्रतिनिधि नहीं बनाना चाहेंगे।"
शहर के प्रतिष्ठित तिलभंडारेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य पुजारी बद्रीनाथ उपाध्याय का मानना है कि जोशी को हिंदू और खासकर आरएसएस और भाजपा से जुड़े होने का फायदा मिला। दूसरी ओर, मुख्तर की खराब छवि ने उन्हें जीतने नहीं दिया। बकौल उपाध्याय, "यह बहुत चौंकाने वाला नतीजा नहीं है। भाजपा के प्रत्याशी यहां से जीतते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ समय से भाजपा ने यहां से अच्छे प्रत्याशी नहीं खड़े किए थे। इसी का फायदा पिछली बार कांग्रेस को मिला था। दूसरी बात यह है कि इस बार मुस्लिम मतों का बंटवारा हो गया। कांग्रेस और बसपा के बीच मतविभाजन के कारण जोशी को आगे निकलने का मौका मिल गया। मुख्तार को राजेश कुमार ने नुकसान पहुंचाया और इस लड़ाई में न तो फायदा कांग्रेस का हुआ और न ही सपा का।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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