देश भर में 'जय हो' की गूंज (राउंडअप)

कांग्रेस जहां सबसे बड़ी पार्टी वहीं उसके नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरकर सामने आया है।

543 सदस्यों वाली लोकसभा में कांग्रेस 206 सीटें जीतने के करीब है। इस आंकड़े ने न सिर्फ सभी राजनीतिक पंडितों को बल्कि कांग्रेस पार्टी तक को चौंका कर रख दिया है। कांग्रेस के पक्ष में अंदर ही अंदर चल रही लहर को भांपने में सभी विफल रहे। एक बार फिर कांग्रेस अपने पुराने रूतबे को पाने में सफल रही है।

कांग्रेस के इस शानदार प्रदर्शन के सामने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और वाम मोर्चे के नेतृत्व वाले कथित तीसरे मोर्चे का प्रदर्शन बौना साबित हुआ। भाजपा वर्ष 2004 में मिले आंकड़ों को छू नहीं पाई तो वामपंथी दलों को दो दर्जन सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संप्रग को 260 के करीब सीटें मिलने की संभावना है, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 के आंकड़े के काफी करीब है।

कांग्रेस को मिली कामयाबी के मद्देनजर अकबर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय तथा पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास के बाहर सैंकड़ों समर्थकों हुजूम जुट गया और ढोल-नगाड़े बजने लगे।

उधर, भाजपा को इन परिणामों से तगड़ा झटका लगा है। पिछले पांच साल से सत्ता में लौटने का इंतजार कर रही पार्टी को कई जगहों पर आशा के प्रतिकूल नतीजे सामने आए। कहीं-कहीं तो उसका सफाया ही हो गया। दिल्ली में भाजपा के मुख्यालय में मायूसी का आलम देखा गया। समर्थक उदास और हतप्रभ दिखाई दिए।

चुनावी नतीजे स्पष्ट होने के बाद भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में नतीजों की समीक्षा की गई। बैठक में आडवाणी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ने की इच्छा जताई। हालांकि पार्टी नेताओं ने उनकी इस इच्छा को सहर्ष अस्वीकार कर दिया।

क्षेत्रीय दलों और वामपंथी दलों को मिलाकर बने तीसरे मोर्चे की स्थिति काफी खराब रही। वाम दलों के गढ़ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल और केरल में उसे काफी नुकसान हुआ है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने उसके किले को ढहा दिया है।

कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपार सफलता मिली है। यहां उसका खोया जनाधार लौटता दिखा। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में संप्रग का प्रदर्शन शानदार रहा तो कर्नाटक और बिहार में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन शानदार रहा। मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और उत्तरांचल में भाजपा का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा।

नतीजों के लिहाज से वाम दलों के बाद सबसे बड़ा झटका राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) को लगा है। लालू को बिहार की चार सीटों पर ही सफलता मिल सकी है। किसी तरह उन्होंने सारण की जीती लेकिन पाटलिपुत्र से वह चुनाव हार गए। लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान अपनी परम्परागत हाजीपुर संसदीय सीट से चुनाव हार गए। उनकी पार्टी को तो खाता तक नहीं खुला।

सपा 2004 की 36 सीटों के मुकाबले खिसककर 23 पर पहुंच गई है। कल्याण सिंह के साथ जाना उसके लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का प्रदर्शन भी आशा के अनुरूप नहीं रहा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का प्रदर्शन चौंकाने वाला रहा। कांग्रेस ने राज्य की 22 सीटों पर सफलता हासिल की।

चुनावी परिदृश्य साफ होने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, "लोगों ने कांग्रेस पार्टी पर अपना विश्वास व्यक्त किया है। यह संप्रग की जीत है। लोगों ने एक बार फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व पर भरोसा जताया है।"

उन्होंने कहा, "धर्मनिरपेक्ष और स्थायी सरकार बनाना हमारी प्रतिबद्धता है। मैं सभी राजनीतिक दलों से आग्रह करता हूं कि वे पुराने मतभेदों को भुलाकर एक धर्मनिरपेक्ष सरकार के गठन में अपना योगदान दें। हमें एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहना चाहिए।"

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मौके पर कहा कि देश की जनता को मालूम है कि उनके लिए क्या अच्छा है। जनता ने हमेशा सही पसंद को चुना है। पार्टी को भारी सफलता दिलाने के लिए देश की जनता को मैं बधाई देती हूं। मनमोहन सिंह ही नई सरकार में प्रधानमंत्री होंगे।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सुल्तानपुर में संवादाताओं से बातचीत में कहा, "उत्तर प्रदेश की जनता ने धर्म और जातीयता की राजनीति करने वालों को पूरी तरह नकार दिया है। लोगों ने विकास के नाम पर मतदान किया है। कांग्रेस पिछले तीन वर्षो में विकास करने में ही लगी हुई थी।"

उन्होंने कहा, "टीम वर्क बहुत महत्वपूर्ण है। जीत का श्रेय उत्तर प्रदेश की जनता को जाता है। जनता गंदी राजनीति से ऊब चुकी थी। वह बदलाव चाहती थी। हमारी चुनौती तो अब शुरू होती है।"

नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि चुनावों में एक जीतता है तो दूसरा हारता भी है। हमारे विरोधियों ने मजबूती से चुनाव लड़ा। आडवाणीजी ने खुद बहुत मेहनत की। चुनावी नतीजे स्पष्ट करते हैं कि देश की जनता एकता चाहती है। वह साफ सुथरी और ईमानदार राजनीति के हक में है।

मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव प्रकाश करात ने हार स्वीकारते हुए कहा कि माकपा और वामदलों को इस चुनाव में भारी झटका लगा है। पार्टी के खराब प्रदर्शन की गंभीरता से समीक्षा करने की जरूरत है। पोलित ब्यूरो दो पारंपरिक गढ़ों पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी के कमजोर होने के कारणों की समीक्षा करेगी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के महासचिव ए.बी.बर्धन ने संवाददाताओं से कहा, "हमेशा की तरह वह विपक्ष में बैठेंगे और गरीब लोगों के हितों के लिए लड़ते रहेंगे। कांग्रेस विजयी हुई है और वह इस समय सरकार बनाने की स्थिति में है। उनको हमारे समर्थन की क्या आवश्यकता है? अपने पूरे जीवन में हम विपक्ष में रहे और हम विपक्ष में ही रहेंगे।"

रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपनी हार के बाद पटना में संवाददाताओं से कहा कि कांग्रेस से सीट बंटवारे को लेकर तालमेल नहीं करना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी।

उन्होंने कहा, "परिणामों से मैं खुश हूं। संतोष इस बात का है कि जनता ने भाजपा को नकार दिया। लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ हमारे गठबंधन को भी बिहार की जनता ने नकार दिया। हार की हम समीक्षा करेंगे। विकास के नाम पर लोगों ने मतदान नहीं किया।"

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने मिलीभगत करके मुसलमान समाज को गुमराह किया, जिससे बसपा को मुस्लिम वोट नहीं मिला। बसपा को हराने में भाजपा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बसपा वोट प्रतिशत में कांग्रेस और भाजपा के बाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनकर उभरी है। बसपा को इस बार देशभर में 6.22 फीसदी वोट मिला है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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