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दरक गईं 'लाल क़िले' की दीवारें?

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दरक गईं 'लाल क़िले' की दीवारें?

बल्कि यह कहना ज़्यादा सही है कि इस बार वामपंथियों के 'लाल क़िले' में तीन दशकों बाद इस बार विपक्ष ने भारी सेंध लगा दी है.

चुनावों में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस गठबंधन ने वाममोर्चा को इस क़दर झटका दिया है, जिसका अनुमान ख़ुद मोर्चा के नेताओं को भी नहीं था.

उसके कई दिग्गज धराशाई हो गए हैं. साथ ही केंद्र की अगली सरकार में अहम भूमिका निभाने के उसके सपने पर भी पानी फिर गया है.

यह नतीजे दोनों पक्षों के लिए अप्रत्याशित रहे हैं.

न तो वाममोर्चा को इस क़दर पटखनी का अंदेशा था और न ही तृणमूल को इतनी भारी जीत की उम्मीद. इन नतीजों के बाद अब पार्टी आत्ममंथन में जुट गई है.

विश्लेषकों की राय में चुनावों में हार वाममोर्चा सरकार की नीतियों के नाकाम होने का सबूत हैं.

यह सही है कि यह चुनाव लोकसभा का था विधानसभा का नहीं. लेकिन मुद्दे तो लगभग वही थे जो विधानसभा चुनाव में होते हैं. पूरे चुनाव अभियान के दौरान वाममोर्चा के नेता केंद्र की यूपीए सरकार की नाकामियों और अपनी उपलब्धियों को गिनाते रहे.

शर्मनाक हार

इन नतीजों ने उस कहावत को एक बार फिर साबित किया है कि इतिहास ख़ुद को दोहराता है.

वर्ष 1984 की कांग्रेस लहर के समय भी वाममोर्चा को 26 सीटें मिली थीं और कांग्रेस को 16. नतीजे इस बार भी लगभग वही हैं, बस दोनों दलों के छोर बदल गए हैं.

नतीजों से साफ़ है कि नंदीग्राम, सिंगूर और सच्चर समिति की रिपोर्ट ने इन चुनावों में अल्पसंख्यकों को वाममोर्चा से दूर कर दिया. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के भाजपा का दामन छोड़ने से यह वोट बैंक उसके पाले में गया है.

राज्य के अल्पसंख्यक बहुल ज़िलों में वाममोर्चा उम्मीदवारों की पराजय से यह बात बिल्कुल साफ़ है.

इसके अलावा बीते साल जुलाई में केंद्र की यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने की कोशिशें भी वाममोर्चा पर भारी पड़ी हैं.

तृणमूल को फ़ायदा

इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को ज़बर्दस्त फ़ायदा हुआ है. कांग्रेस ने अपनी पुरानी स्थिति को ही लगभग बरक़रार रखा है.

लेकिन 1999 में नौ सीटों से वर्ष 2004 में महज़ एक सीट पर सिमटने वाली तृणमूल ने इस बार तमाम रिकार्ड तोड़ दिए हैं.

इस बार न वाममोर्चा का औद्योगिकीकरण का पासा चला और न ही केंद्र की यूपीए सरकार की नाकामी का राग.

राज्य में तीनों दौर में भारी मतदान के बाद माकपा के शीर्ष नेताओं को सरकार विरोधी रुझान की जो आशंका सता रही थी वह पूरी तरह सच साबित हुई है.

वैसे, बीते विधानसभा चुनावों में भी भारी मतदान हुआ था. लेकिन तब वाममोर्चा को रिकार्ड कामयाबी मिली थी. लेकिन इस बार यह भारी मतदान वाममोर्चा के खिलाफ़ गया है.

न लहर, न मुद्दा

वामपंथियों पार्टियों ने भारत-अमरीका परमाणु समझौते का विरोध किया था

राज्य में किसी के पक्ष में न तो कोई लहर थी और न ही कोई नया मुद्दा.

टाटा की लखटकिया को माकपा ने भी मुद्दा बनाया था और तृणमूल ने भी. लेकिन माकपा की लखटकिया नहीं चली.

सिंगूर और नंदीग्राम जैसे पुराने मुद्दे इस लोकसभा चुनाव में हिट साबित हुए. उन इलाकों में माकपा के तमाम उम्मीदवार पिट गए हैं.

दरअसल, वाममोर्चा को इन मुद्दों की वजह से तो झटका लगा ही है, उसकी इस दुर्गति के लिए ख़ुद पार्टी व उसकी नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं.

औद्योगिकीकरण के लिए जबरन ज़मीन अधिग्रहण का मुद्दा काफ़ी असरदार रहा. कम से कम तमलुक और हुगली के नतीजे तो यही बताते हैं.

माकपा के एक बड़े गुट के विरोध के बावजूद पार्टी ने तमलुक में उसी लक्ष्मण सेठ को टिकट दिया था जिन्होंने नंदीग्राम में आंदोलन की चिंगारी को पलीता दिखाया था. नतीजा सेठ की हार के तौर पर सामने आया है.

इस चुनाव में वाममोर्चा ने अपना पिछला रिकार्ड भी तोड़ दिया है.

बंगाल में अपनी सत्ता के इन 32 वर्षों में इससे पहले वर्ष 1984 के कांग्रेस लहर के दौरान भी उसने 42 में से 26 सीटें जीती थीं.

वाममोर्चा नेताओं को इस बार नुक़सान का अंदेशा तो था. कट्टर से कट्टर वामपंथी भी मोर्चे को 25 से ज़्यादा सीटें देने के लिए तैयार नहीं था.

माकपा के विवादास्पद नेता व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने तो पहले ही वाममोर्चा को 28 सीटें मिलने का एलान कर दिया था. लेकिन ऐसा लगता है कि परिसीमन और सरकार की नीतियों ने अपने ही गढ़ में वामपंथियों की लुटिया डुबो दी.

राज्य में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में कोई ख़ास लहर नहीं थी. इसलिए यह नतीजे राज्य सरकार और वाममोर्चा की नीतियों के प्रति लोगों की नाराजगी का इज़हार हैं.

शहरी सीटें तो माकपा के हाथ से निकली ही हैं, अपने सबसे मज़बूत गढ़ रहे ग्रामीण इलाक़ों में भी उसे ज़बर्दस्त मुँह की खानी पड़ी है.

मूड भाँपने में नाकाम

माना जाता है कि सिंगूर मुद्दे पर भी सरकार की नीतियों से जनता नाराज़ थी

नतीजों से साफ़ है कि या तो अपने अतिरिक्त आत्मविश्वास के चलते वामपंथियों ने जनता का मूड भांपने में नाकाम रहे या फिर वे जानबूझ कर अपनी कमियों और कमज़ोरियों पर पर्दा डालते रहे और 28 से 32 सीटें जीतने का दावा करते रहे.

ऐसा नहीं होता तो मतगणना से एक दिन पहले तक माकपा नेता 30-32 सीटें जीतने का दावा नहीं कर रहे होते.

दरअसल, सिंगूर व नंदीग्राम की घटनाओं के बाद राज्य में हुए हर उपचुनाव, नगर पालिका चुनाव और पंचायत चुनाव में विपक्ष को लगातार बढ़त मिलती रही है.

अब वामपंथियों की असली चिंता और प्राथमिकता इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है.

आख़िर दो साल बाद ही राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं.

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस बार माकपा का खेल परिसीमन ने नहीं, उसकी नीतियों और अल्पसंख्यकों वोटरों की दूरी ने गड़बड़ाया है.

परिसीमन का असर तो कमोबेश सभी सीटों पर था. वैसे, पार्टी के कई समर्थक परिसीमन के चलते चुनाव अभियान के दौरान कोलकाता दक्षिण सीट पर ममता बनर्जी के हार के दावे करते भी नज़र आए थे.

पार्टी के केंद्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं के बयानों और टिप्पणियों में तालमेल का अभाव साफ़ नजर आया. इसके अलावा नंदीग्राम और सिंगूर जैसे मुद्दे शहरी मतदाताओं पर भी असरदार साबित हुए.

इन मुद्दों को दोनों गठबंधन अपने-अपने तरीक़े से भुनाने का प्रयास कर रहे थे. लेकिन इनमें कामयाबी मिली विपक्ष को.

कुल मिला कर बंगाल में अपनी सत्ता के 32 वर्षों में इस बार मोर्चा को जितनी चोट लगी है उस घाव को भरने में उसे लंबा वक़्त लगेगा.

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