मुझे कला प्रदर्शनियों से नफरत है : जतिन दास

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। नौ वर्षो बाद दिल्ली में अपनी एकल कला प्रदर्शनी आयोजित कर रहे जाने-माने पेंटर जतिन दास का कहना है कि आज की कला प्रदर्शनी पैसा कमाने का तरीका बन गई है और इसलिए उन्हें इससे नफरत है।

दास ने यहां आईएएनएस से बातचीत में कहा, "मुझे लगता है कि आज की कला प्रदर्शनियों का लक्ष्य ही बन गया है पैसा कमाना। कई युवा पेंटर पश्चिमी दुनिया की नकल कर अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी आयोजित कर पैसा कमाने की कोशिश में है। वे दुनिया भर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ऐसे मौके तलाशते हैं। मीडिया में छाने की कोशिश के पीछे भी कलाकृतियों को अधिक से अधिक कीमतों में बेचने का लक्ष्य छिपा रहता है। मैं इस प्रवृत्ति के बिल्कुल खिलाफ हूं।"

वह कहते हैं कि आजकल हर पेंटर प्रदर्शनी आयोजित कर सुर्खियां बटोरना चाहता है। वह कहते हैं, "कला प्रदर्शनी सम्राटों की पोशाकों की तरह होती है, जिसे लेकर मीडिया में सनसनी परोसी जाती है और लोगों का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की जाती है।"

वैसे, उनका मानना है कि अगर प्रदर्शनी का लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना नहीं हो तो इससे कई अच्छी बातें उभरकर सामने आती हैं। वह कहते हैं, "पेंटिंग करना वाकई जुनून की तरह है, पर इनकी प्रदर्शनी उबाऊ और नीरस होती है।" जानी-मानी अभिनेत्री नंदिता दास के इस पेंटर पिता का कहना है कि कला के लिए विशेष संवेदना की जरूरत पड़ती है।

वह अपनी बेटी नंदिता को न सिर्फ अभिनेत्री बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता भी मानते हैं। नंदिता के बारे में वह कहते हैं, "मैं नंदिता को बॉलीवुड स्टार नहीं मानता हूं। बॉलीवुड स्टार शब्द से अश्लीलता की बू आती है। नंदिता की परवरिश एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर हुई है। उनकी यही पहचान मौलिक है। वह बालीवुड स्टार की परिभाषा के दायरे में नहीं आती।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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