तालेबान आ भी चुके जा भी चुके

Swat

क्या आप ये सोच सकते हैं कि मौलाना फ़ज़लुल्लाह एक दिन इस्लामाबाद के राष्ट्रपति भवन में बैठे होंगे और उनके पीछे मुल्ला ऊमर का चित्र लगा होगा?लगभग सारा पाकिस्तानी इसका जवाब नहीं में देगा. पाकिस्तान की फ़ौज ऐसा कभी नहीं होने देगी. जनता ने चुनावों में हमेशा मुल्लाइयत को नकारा है, हमारे लोगों का इस्लाम मौलवी का नहीं सूफ़ी का इस्लाम है.

पाकिस्तान के ज़्यादातर लोग दुनियादार क़िस्म के लोग हैं धंधे पर कभी समझौता नहीं करते चाहे उन्हे परलोक के अज़ाब से डराया जाए. जब धंधा ज़्यादा चल पड़े और अज़ाब से ज़्यादा डर लगने लगे तो एक आध उमरा करके बीमा ख़रीद लेते हैं. किसी मस्जिद मदरसे के निर्माण में हिस्सा ले लेते हैं, कभी कभी गाड़ी के शीशे पर दस्तक देने वाले अपाहिज को बीस रूपए का नोट दे कर कानों का हाथ लगाते हैं और ख़ुदा का लाख लाख शुक्र अदा करते हैं.

उन लोगों का तालेबान के जेहाद से वही संबंध है जो फ़िल्म देखने वालों का फ़िल्म के हीरो से होता है. गंडासा उठा कर ज़ालिम ज़मीनदार की आंतें निकालना या क्लाशनिकोफ़ उठा कर काफ़िरों की लाशों का ढेर लगाने की ख़्वाहिश सबके अंदर मौजूद है (या कम से कम पाकिस्तान के नवजवानों को अक्सर ये ख़्याल आता है) लेकिन धंधे नौकरियाँ और पारिवारिक ज़िम्मेदारियां उस सपने को साकार होने की अनुमति नहीं देतीं.

महिलाओं की एक और प्रकार है जो तालेबान के अग्रदूत दस्ते के निशाने पर रहती है और वह हैं ग़ैर सरकारी संस्थानों (एनजीओ) में काम करने वाली महिलाएं. उनके दफ़्तरों पर हमले, हत्या, अपहरण, और उसके बाद हत्या इस तरह से लगातार हो रही हैं कि न सिरफ़ मीडिया उनकी कवरेज सरसरी अंदाज़ में करता है बल्कि एनजीओ ख़ुद भी किसी प्रभावशाली तरीक़े से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में असहाय है.

महिलाओं की एक और प्रकार है जो तालेबान के अग्रदूत दस्ते के निशाने पर रहती है और वह हैं ग़ैर सरकारी संस्थानों (एनजीओ) में काम करने वाली महिलाएं. उनके दफ़्तरों पर हमले, हत्या, अपहरण, और उसके बाद हत्या इस तरह से लगातार हो रही हैं कि न सिरफ़ मीडिया उनकी कवरेज सरसरी अंदाज़ में करता है बल्कि एनजीओ ख़ुद भी किसी प्रभावशाली तरीक़े से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में असहाय है.

तो इस पृष्टभूमि में कुछ हज़ार दाढ़ियों और रॉकेट लॉंचरों वाले एक पूरी क़ौम को कैसे अपना अधीन करेंगे, एक पूरे देश पर कैसे क़ब्ज़ा करेंगे.

शुरूआत छोटे क़दम से

हर लंबे सफ़र की शुरूआत एक छोटे से क़दम से होती है और अगर तालेबान का सफ़र देखा जाए तो उनके पहले क़दम का रुख़ बता देता है कि कारवां चल पड़ा है.अभी कुछ साल पहले वाना में बच्चियाँ स्कूल में जाती थीं, अलग कमरों में बैठती थीं, पर्दे में जाती थीं लेकिन जाती ज़रूर थीं.

पहले धमकियों वाले ख़त, फिर छोटे धमाके, फिर बड़े धमाके, और अगर फिर भी कोई रास्ते पर नहीं आए तो सर धर से अलग और अगर दिल में दया आ जाए तो सर में सिर्फ़ एक गोली.

लड़कियों के स्कूल जाने के विरुद्ध ये आंदोलन वाना से शुरू हुआ था और अंतिम ख़बरों के अनुसार लाहौर के मश्हूर कनेएर्ड कॉलेज के अधिकारियों ने अपनी छात्राओं को जीन्स और शर्ट पहनने का मनाही कर दी है. किसी ने कहा कि अगर तालेबान वो शलवार कमीज़ ही देख लें जो कनेअर्द कॉलेज की लड़कियां पहनती हैं तो उनकी रातों की नींदें हराम हो जाएं. लेकिन कालेज प्रशासन ने कहा है कि उन्होंने ये क़दम किसी के डर से नहीं किया बल्कि कॉलेज के मौजूदा ड्रेस कोड को लागू करने के लिए किया है. एनजीओ में काम करने वाली महिलाएं ख़ास तौर से तालेबान के निशाने पर हैं

(जिस प्रकार हमारी बेचारी सरकार मालाकंड में पहले मौजूद न्यायिक प्रणाली को सिर्फ़ लागू कर रही थी) और सच्ची बात तो ये है कि तालेबान को लाहौर आने की ज़रूरत ही नहीं. बहुत से लोग मीडिया पर ये कहते पाए जाएंगे कि अगर शलवार टख़ने से ऊपर करने से शांति की स्थिति बेहतर हो सकती है तो पश्चिम को चाहने वाले लोग इस पर इतना शोर क्यों मचा रहे हैं. अगर हमारी पाकीज़ा बेटियों को लाहौर को भिवंडी बनाने वालो की बुरी नज़र से बचाने के लिए सर पर दुपट्टा लेने और ज़्यादा शरीर को न सजाने का आदेश दिया जा रहा है तो इसमें तालेबान कहां से आ गए.

हमारा कल्चर

आख़िर ये तो हमारा अपना कल्चर है. हम उसकी तरफ़ लौट रहे हैं. ये दलील देने वालों को ये भी याद नहीं रहेगा कि उनकी माओं ने कभी बुर्क़ा नहीं पहना था लेकिन अपनी बेटियों को पहना कर न जाने वो किस संस्कृति का बढ़ा रहे हैं.

स्वात के शहर मंगूरा में संगीत और फ़िल्मों की सीडी बेचने वाली 400 दुकानें थीं. तालेबान आएं या जाएं अब ये दुकानें काफ़ा समय के लिए बंद रहेंगी. दो महीने पहले इस बाज़ार से गुज़रा तो एक दुकानदार कबाब बना कर बेचने की कोशिश कर रहा था. बेचारे को न कबाब बनाने का अनुभव था और न बेचने का. देख लें आ गई शरीयत, उसने कबाब की सीख़ें उलटते पलटते कहा.

मंगूरा लाहौर से बहुत दूर है लेकिन यहां के कारोबारी दुनिया ज़्यादा देखे हुए हैं उन्होंने कुछ महीने पहले ही ख़ुद से गंदी सीडी और फ़िल्मों का आग लगा दिया. स्वतंत्र अदालत ने इस रवैये को संवैधानिक और क़ानूनी सुरक्षा देते हुए पंजाब की सबसे लोकप्रिय गायिका नसीबूलाल और उसकी बहन के दर्जनों गानों पर पाबंदी लगा दी. लाहौर के थिएटरों के बाहर छोटे धमाके हो चुके, बड़ों का इंतज़ार है. आप को समाज में बहुत से लोग ये कहते भी मिल जाएंगे कि वास्तव में इन नाटकों के पीछे दो बातें हैं और उनमें लड़कियां नृत्य करती हैं इस लिए.

शायद ये दलील भी कि तालेबान स्वर्गीय इक़बाल बानू को तो बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन आप खु़द ही बताएं कि नसीबूलाल के गाने आप परिवार के साथ सुन सकते है. पिछले दिनों शिंक्यारी में तीन महिलाकर्मियों की गोली मार कर हत्या कर जंगल में फेंक दिया गया

अब शक होने लगा कि अगर कल कोई ये फ़तवा दे दे कि पालक खाना हराम है तो पंजाब के कई सबज़ी बेचने वाले इसे ख़रीदने और बेचने से परहेज़ करेंगे और किसानों से कहेंगे कि सरसों का साग उगाओ वो हमारा कल्चर है, पालक तो पश्चिमी देश से आया है. और अगर कोई बेचारी महिला ये कह बैठे कि पालक को साग के साथ अगर न पकाएं तो स्वाद ठीक नहीं होता तो निश्चित ही कोई इतिहासकार हमें ये समझाएगा कि ये एक हिंदू परंपरा थी जो हमारी जाहिल महिलाओं ने अपना लिया.

एनजीओ निशाने पर

महिलाओं की एक और प्रकार है जो तालेबान के अग्रदूत दस्ते के निशाने पर रहती है और वह हैं ग़ैर सरकारी संस्थानों (एनजीओ) में काम करने वाली महिलाएं. उनके दफ़्तरों पर हमले, हत्या, अपहरण, और उसके बाद हत्या इस तरह से लगातार हो रही हैं कि न सिरफ़ मीडिया उनकी कवरेज सरसरी अंदाज़ में करता है बल्कि एनजीओ ख़ुद भी किसी प्रभावशाली तरीक़े से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में असहाय है.

अभी पिछले दिनों शिंक्यारी में तीन महिलाकर्मियों की गोली मार कर हत्या कर जंगल में फेंक दिया गया. किसी अख़बार ने दो इंच से ज़्यादा ख़बर नहीं लगाई. किसी टीवी चैनल के किसी शो पर किसी विश्लेषक ने उसका ज़िक्र करना मुनासिब नहीं समझा, क्यों. इसलिए कि उस महिलाकर्मी को मारने के ताने बाने तो हमारे कल्चर से मिलते हैं.

हमारी बहनें और बेटियां विदेशी संस्थानों से वेतन लेती हैं, फिर गाड़ियों और जीपों में बैठ कर सुदूर गांव में जाकर हमारी मासूम महिलाओं को भटकाने की कोशिश करती हैं और ये बेहयाई और बेग़ैरती का ऐसा मिला जुला रूप है जिसके विरुद्ध हमारा मीडिया आवाज़ नहीं उठा सकता है.

मौलाना फ़ज़लुल्लाह को शायद पाकिस्तानी राष्ट्रपति के दफ़तर में बैठना कभी नसीब ने हो लेकिन उस दफ़तर पर 11 साल तक एक तालिब बैठा रहा जिसका नाम ज़ियाउलहक़ था. कभी कभी तो ऐसा लगता है कि तालेबान आ रहे हैं का नारा लगाने वाले ग़लती पर हैं. क्योंकि तालेबान आ भी चुके और जा भी चुके, दोबारा उन्हें आने की शायद ज़रूरत इसलिए न पड़े कि उनके काम हम भलीभांति निभाएंगे, कभी ख़ौफ़ से और कभी शौक़ से.

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