'पाकिस्तान में तालेबान का बढ़ता प्रभाव'

'पाकिस्तान में तालेबान का बढ़ता प्रभाव'

पिछले कुछ हफ़्तों की लगातार फ़ौजी कार्रवाई के बावजूद पाकिस्तान की सरकार और फ़ौज इन इलाक़ों से तालेबान का क़ब्ज़ा पूरी तरह से समाप्त कराने में विफल रही है.

ज़रदारी ने सर्वेक्षण को ग़लत बताया

परिणामस्वरूप सरकार सूबा सरहद में 38 प्रतिशत भाग तक ही सीमित हो कर रह गई है.

तालेबान प्रशासित इन क्षेत्रों में उत्तरी पाकिस्तान की 22 प्रतिशत जनसंख्या आती है.

इस हिसाब से तालेबान सूबा सरहद और क़बायली इलाक़ों की 65 लाख जनता पर राज कर रहे हैं जबकि अन्य डेढ़ करोड़ लोग इस ख़ौफ़ में जी रहे हैं कि उनका इलाक़ा किसी भी वक़्त तालेबान के क़ब्ज़े में आ सकता है.

इस प्रकार सरकार का नियंत्रण उत्तरी पाकिस्तान की सिर्फ़ 28 प्रतिशत आबादी तक सीमित हो कर रह गया है.

सूबा सरहद में तालेबान प्रशासित क्षेत्रों में स्वात, बुनेर, शांग्ला, और लोवर देर शामिल हैं जबकि क़बायली इलाक़ों में औरकज़ई एजेंसी, उत्तरी वज़ीरिस्तान, दक्षिणी वज़ीरिस्तान और बाजौड़ इस वक़्त पूरी तरह से तालेबान या उनके समर्थक लड़ाकों के क़ब्ज़े में हैं.

'सरकार का राज नहीं'

इन सारे क्षेत्रों में सरकार का राज बिल्कुल नहीं के बराबर है.

इन क्षेत्रों से बड़ी तादाद में लोगों का पलायन हुआ है

पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में दक्षिणी वज़ीरिस्तान, उत्तरी वज़ीरिस्तान, औरकज़ई एजेंसी, और बाजौड़ तो स्वात में तालेबान के हावी होने से पहले ही तालेबान या उनके समर्थक लड़ाकों के निशाने पर आ चुके थे लेकिन स्वात में हुए शांति समझौते के कुछ महीनों के अंदर तालेबान ने सूबा सरहद की देखभाल करने वाले ज़िले शांग्ला, बुनेर, और लोवर देर पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.

इसके अलावा उन्होंने किसी न किसी हद तक ऊपरी देर, स्वाबी मरदान, पेशावर, मालाकंड, हंगू, कोहाट, लकी मरौत, टांक और डेरा इस्माइल ख़ान में भी अपनी पूरी उपस्थिति दर्ज कर ली है.

बीबीसी के संवाददाताओं की रिपोर्टों की मदद से तैयार किए गए सूबा सरहद के नक़्शे के अनुसार सरकारी नियंत्रण अब सूबा सरहद के उत्तरी ज़िले चित्राल, उत्तर-पूर्वी ज़िला कोहिस्तान, बटग्राम, मानसेहरा, ऐबटाबाद, हरीपुर, मध्य ज़िले चारसेदा, नौशहरा, और दक्षिणी ज़िले करक तक सीमित हो कर रह गया है.

हमारे संवाददाताओं के अनुसार क़बायली इलाक़ों में महमंद, ख़ैबर और करम ऐसी एजेंसी हैं जहाँ तालेबान या उनसे जुड़े लड़ाका न सिर्फ़ वहाँ पूरे तौर पर मौजूद हैं बल्कि वे इन एजेंसियों के अधिकतर क्षेत्रों पर नियंत्रण रखे हुए हैं.

इन इलाक़ों में तालेबान के नियंत्रण की सबसे बड़ी मिसाल ख़ैबर एजेंसी में मिलती है, जहाँ नैटो को रसद पहुँचाने वाले क़ाफ़िलों पर बाक़ायदा हमले होते हैं. हमारे संवाददाताओं के अनुसार ख़ैबर के दो इलाक़ों- बाड़ा और जमरूदपुर पर चरमपंथियों का पूरा नियंत्रण है.

सरकार पर दबाव

तालेबान के बढ़ते प्रभाव का मैप

फिर भी इन तीनों एजेंसियों में सरकार स्थानीय लश्करों के ज़रिए कम से कम एजेंसी मुख्यालय तक अपना नियंत्रण क़ायम रखे हुए है और इसीलिए उन्हें भी ऐसे ही क्षेत्रों में गिना जाता सकता है जहाँ तालेबान या उनके समर्थक चरमपंथी पूरी तरह से क़ब्ज़ा कर चुके हैं. इसेक अलावा इन तीनों एजेंसी में नागरिकों की पहुँच और मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग लगभग असंभव है.

इन तीन एजेंसियों के विपरीत बाजौड़, ओरकज़ई, उत्तरी वज़ीरिस्तान, और दक्षिणी वज़ीरिस्तान पूरी तरह से तालेबान के क़ब्ज़े में हैं. पाकिस्तानी फ़ौज दक्षिणी वज़ीरिस्तान के अधिकृत इलाक़ों से लगभग पूरी तरह निकल चुकी है जबकि बाक़ी इलाक़े पर वज़ीर क़बीले के तालेबान का क़ब्ज़ा है. सूचना के मुताबिक़ उत्तरी और दक्षिणी वज़ीरिस्तान में बड़ी संख्या में विदेशी चरमपंथी मौजूद हैं.

औरकज़ई एजेंसी में स्थानीय तालेबान कमांडर हकीमुल्ला महसूद वज़ीरिस्तान में आत्मघाती हमला करने और चरमपंथी बनाने वाले लड़ाके क़ारी हुसैन के रिश्तेदार हैं. यहाँ स्थानीय शिया और सुन्नी में तनाव रहता है जिसकी वजह से निचले औरकज़ई में तालेबान चाहे-अनचाहे भी सुन्नियों की मदद करते हैं. इस सांप्रदायिक तनाव ने इलाक़े में सरकारी तंत्र को बिल्कुल बेबस कर दिया है.

बाजौड़

तालेबान के बढ़ते प्रभाव का मैप

बाजौड़ में अक्तूबर 2006 में एक बड़े मिसाइल हमले में 80 लोग मारे गए थे, जिसके सिर्फ़ नौ दिन बाद दरगई के फ़ौजी प्रशिक्षण केंद्र पर हमला करके तालेबान ने पहली बार पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इलाक़े में बड़ी कारवाई करने की क्षमता का सबूत दिया था.

दरगई फ़ौजी कैंप पर हमले में 40 से ज़्यादा जवान मारे गए थे. उसके बाद सरकार और फ़ौज ने कई बार स्थानीय जिरगों के ज़रिए बाजौड़ एजेंसी को वापस नियंत्रण में लाने की कोशिश की लेकिन एक के बाद एक असफलताओं के बाद स्थानीय तालेबान समर्थक चरमपंथियों से संधि करके इलाक़ा छोड़ दिया.

हमारे संवाददाताओं के अनुसार बाजौड़ एजेंसी पर तालेबान का आंशिक राज है लेकिन कुछ समय से तालेबान और फ़ौज आमने सामने नहीं हैं. बाजौड़ में इत्मानख़ील क़बीले ने शुरू से तालेबान का विरोध किया है इसलिए इस इलाक़े में उनको समर्थन नहीं मिल सका है. उसके बावजूद बाजौड़ तालेबान का एक मज़बूत गढ़ है जहाँ फ़ौज का नियंत्रण होने के बावजूद तालेबान अपनी कारवाई करने की पूरी क्षमता रखते हैं.

प्रशासित क्षेत्र

तालेबान के बढ़ते प्रभाव का मैप

प्रशासित इलाक़ों स्वात, शांग्ला, बुनेर, लोवर देर के ज़िलों पर तालेबान पिछले कुछ हफ़्ते से पूरी तरह से क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं. इन ज़िलों से गुज़रने वाले सारे रास्तों पर उन्होंने अपना नियंत्रण बना रखा है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि स्वात के बाद तालेबान को उन ज़िलों में अपना नियंत्रण स्थापित करने में मालाकंड के कमिश्नर सैयद मोहम्मद जावेद से बाक़ायदा मदद मिली जिसके कारण उन्हें उस पद से हटा दिया गया.

फिर भी पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के अमरीकी दौरे के साथ ही शुरू होने वाले फ़ौजी अभियान ने तालेबान के कमांडर और कंट्रोल सिस्टम को काफ़ी क्षति पहुँचाई है. फ़िलहाल उन इलाक़ों पर सरकारी नियंत्रण पूरी तरह बहाल नहीं हो सका है. लेकिन अगर इस अभियान के मक़सद पूरे हो जाते हैं तो आने वाले हफ़्तों में ये इलाक़े वापस सरकार के नियंत्रण में आ सकते हैं.

इन चारों ज़िलों का कुल क्षेत्रफल 10371 वर्ग किलोमीटर है जबकि यहां की कुल आबादी लगभग 44 लाख है. लेकिन उस से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण उन क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं हैं. लोवर देर स्वात और क़बायली इलाक़ों के बीच पुल का काम करता है और इस इलाक़े में तालेबान का नियंत्रण स्थापित होने से स्वात और क़बायली इलाक़ों की बाजौड़ एजेंसी में तालेबान के आवागमन के लिए एक बाक़ायदा रास्ता बन गया है.

इसके अलावा लोवर देर पर तालेबान के क़ब्ज़े के बाद चित्राल ज़िले का ज़मीनी संबंध पूरे तौर पर कट गया है. साल में ठंड के छह या सात महीने तक तो वैसे ही चित्राल का ज़मीनी संबंध पाकिस्तान के बाक़ी क्षेत्रों से कटा रहता है. अब अगर सरकार लोवर देर पर अपना अधिकार बहाल न कर सकी तो चित्राल का ज़मीनी संबंध देश के बाक़ी भाग से हमेशा के लिए कट सकता है.

बुनेर पर नियंत्रण

तालेबान के बढ़ते प्रभाव का मैप

बुनेर पर तालेबान के क़ब्ज़े का एक अहम पहलू ये है कि अगर आने वाले दिनों में तालेबान स्वाबी ज़िले में अपने पाँव जमा लेते हैं तो उन्हें डेरा इस्माईल ख़ान के अलावा उत्तर पंजाब में प्रवेश का एक और महत्वपूर्ण रास्ता मिल जाएगा.

पिछले कुछ सप्ताह में तालेबान के नियंत्रण में आने वाले इन चारों ज़िलों के अलावा सूबा सरहद के कुल 24 में से 11 ज़िले ऐसे हैं जहाँ या तो तालेबान ने अपने उपस्थिति साबित कर दी है या उनके स्थानीय सहयोग इस स्तर पर पहुंच गए हैं कि वह किसी भी समय उन ज़िलों में कोई बड़ी कारवाई कर सकते हैं.

26 हज़ार वर्ग किलो मीटर पर फैले इन 11 ज़िलों में पेशावर, मरदान, स्वाबी, कोहाट, हंगू, बनूं, ऊपरी देर, मालाकंड, लकी मरौत, डेरा इस्माईल ख़ान और टाँक शामिल हैं. इन इलाक़ों की सवा करोड़ आबादी पिछले कुछ दिनों से तालेबान के ख़ौफ़ में जी रही है. इन सारे ज़िलों में तालेबान या उनके समर्थक संगीत की दुकानों पर हमले और गाड़ियों से ज़बर्दस्ती कैसेट प्लेयर उतारने से लेकर आत्मघाती हमले तक बहुत सी कार्रवाईयाँ कर चुके हैं.

भूगोल का असर

तालेबान के बढ़ते प्रभाव का मैप

इन ज़िलों का भूगोल यहाँ तालेबान के बढ़ते हुए प्रभाव को सरकार और फ़ौज के लिए अधिक ख़तरनाक बनाता है. भौगोलिक हिसाब से सूबा सरहद में सरकारी अधिकार चार विभिन्न टुकड़ों में बँटा हुआ है. पहला टुकड़ा बहुत बड़े उत्तरी चित्राल पर आधारित है. चित्राल में फ़िलहाल तालेबान के ठिकानों की कोई ख़बर नहीं लेकिन क्षेत्रफल के हिसाब से तालेबान प्रशासित चारों ज़िलों के कुल क्षेत्रफल से डेढ़ गुना बड़े चित्राल का पहाड़ी इलाक़ा भविष्य में तालेबान और अलक़ायदा चरमपंथियों के लिए दिलचस्पी वाला क्षेत्र बन सकता है. फिर भी स्थानीय आबादी का पश्तून न होना उनके लिए नकारात्मक पहलू साबित हो सकता है.

दूसरा टुकड़ा सूबे के उत्तरी ज़िलों कोहिस्तान, बटग्राम, मानसेहरा, ऐबटाबाद, और हरिपुरा पर आधारित है. सरकारी नियंत्रण इस पट्टी के साथ लगे हुए ज़िलों स्वात, शांग्ला, और बुनेर तालेबान के निशाने पर हैं और अगर तालेबान स्वाबी के ज़रिए ऐबटाबाद और हरिपुर तक फैल जाते हैं तो इस उत्तरी पट्टी का संबंध बाक़ी सूबे से पूरी तरह से कट जाएगा.

यहाँ ये ज़िक्र करना ज़रूरी होगा कि स्वाबी तालेबान में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का इलाक़ा है. यहाँ पर स्थित पंजपीर के मशहूर मदरसे से मौलाना सूफ़ी मोहम्मद और मुल्ला फ़ज़लुल्लाह समेत कई महत्वपूर्ण नेता शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं.

हालांकि अभी तक यहां तालेबानी तर्ज़ की मामूली कारवाईयां हुई हैं लेकिन स्थानीय लोग इस इलाक़े को तालेबानियत का बौद्धिक गढ़ मानते हैं. इस्लामाबाद पेशावर मोटरवे बनने के बाद स्वाबी का इस्लामाबाद तक सफ़र बहुत आसान हो गया है.

सूबा सरहद की राजधानी पेशावर पश्चिम में महमंद और ख़ैबर और ओरकज़ई एजेंसियों में घिरा हुआ है. जबकि इसके उत्तर में मरदान और चारसदह, दक्षिण में कोहाट और पूरब में मरदान और नौशहरा ज़िले हैं. यहाँ पिछले कुछ महीने तालेबान दिन दहाड़े कई वारदात कर चुके हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण नैटो को रसद पहुँचाने वाले ट्रक के अड्डों पर हमले थे जिनमें दर्जनों की संख्या में तालेबान ने लगातार कई हमले करके सैंकड़ो ट्रकों में आग लगा दिया था.

दक्षिणी ज़िले बनूं, लकी मरौत, टांक, और डेरा इस्माईल ख़ान भी एक समय से तालेबान की हिंसक कार्रवाईयों का शिकार हैं. बनूं के अधिकृत ज़िलों में वह एक मात्र ज़िला है जहां अमरीका ड्रोन हमले कर चुके हैं. इसी प्रकार टांक में भी तालेबान सशस्त्र गश्त कर चुके हैं. और डेरा इस्माईल ख़ान समेत यहां बड़ी संख्या में दक्षिणी वज़ीरिस्तान के शरणार्थियों के बस जाने से तालेबान को इन इलाक़ों में आने की खुली छूट है.

टांक और डेरा इस्माईल ख़ान की गिनती आने वाले दिनों में सबसे ख़तरनाक ज़िलों में की जा सकती है क्योंकि यहाँ तालेबान स्थानीय सांप्रदायिक संगठनों का बाक़ायदा समर्थन करते है. साल भर के अंदर यहाँ सांप्रदायिक और आत्मघाती हमलों की कई घटनाएं हुई हैं जिनमें पुलिस स्टेशन और दूसरे सरकारी अधिकारियों पर हमला शामिल है.

पंजाब के ज़िले

पंजाब के इन ज़िलों में चकवाल, मियांवाली, भकर, झंग, मुज़फ़्फ़रगढ़, बहावलनगर, राजनपुर, और डेरा ग़ाज़ी ख़ान शामिल हैं. सूबा पंजाब के 47 प्रतिशत या लगभग आधे भाग पर फैले हुए इलाक़े में सवा दो करोड़ लोग रहते हैं जो पंजाब की 22 प्रतिशत आबादी है. पिछले डेढ़ साल में इन सारे ज़िलों में से कोई न कोई तालेबानी कारवाई की ख़बरें मिली हैं.

अमरीकी समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के ख़तीब यानी वक्ता की पत्नी उम्मे हसान पिछले कुछ महीनों में पंजाब के दक्षिणी ज़िलों के बीस से अधिक दौरे कर चुकी हैं जिसके दौरान उन्होंने कई जलसों को संबोधित भी किया है.

पश्चिमी टीकाकारों की राय में उन इलाक़ों के मदरसों में नौजवानों की एक ऐसी खेप तैयार हो रही है जो तालेबान से वैचारिक नज़दीकी रखती है और जिसे समय आने पर राज्य के विरूद्ध खड़े होने में हिचकिचाहट नहीं होगी.

पाकिस्तानी टीकाकार बार बार इस ख़तरे की ओर इशारा कर चुके हैं कि सरकार समय-समय पर आंतरिक और बाहरी दबाव के चलते सूबा सरहद के तालेबान के विरुद्ध फ़ौजी कारवाई करने पर तैयार तो हो जाती है लेकिन तालेबान की इस वैचारिक पहल को रोकने की ज़रूरत से बिलकुल अनजान नज़र आती है.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+