'स्वात नहीं पहचान और ज़िंदगी छोड़ दी'

'स्वात नहीं पहचान और ज़िंदगी छोड़ दी'

वह कहती हैं, "मैंने स्वात नहीं बल्कि अपनी पहचान और ज़िंदगी छोड़ दी और उन्हें वापस पाने के लिए एक दिन ज़रूर स्वात वापस जाउंगी."

सुरक्षा कारणों से 'गुल मकई' के नाम से डायरी लिखने वाली छात्रा ने अपने पलायन की कहानी पेशावर में बीबीसी के संवाददाता अब्दुल हई काकड़ से कुछ इस प्रकार सुनाई-

मंगल की रात थी कि हर तरफ़ से ज़बरदस्त गोलीबारी की आवाज़ें आना शुरू हो गईं. हम सभी डर के मारे ज़मीन पर लेट गए. पता चला कि फ़ौज और तालेबान के बीच फ़ायरिंग हो रही है.

हमारा घर फ़ौजी केंद्र सर्किट हाउस के क़रीब स्थित है, हमें और भी डर लगने लगा क्योंकि फ़ौजी मुख्यालय में अगर कुछ होता तो हमें ज़रूर नुक़सान पहुँचता.

हम सबने अगले ही दिन स्वात छोड़ने का फ़ैसला किया. हमने ज़रूरत का सामान तैयार कर लिया कि इसी बीच ख़बर आई कि स्वात में कर्फ़्यू लगा दिया गया है.

हम तीन दिन तक घर में फँसे रहे. जब कर्फ़्यू में ढील दी गई तो हम सामान गाड़ी में डाल कर स्वात से रवाना हो गए.

मुझे उस वक़्त बहुत दुख हो रहा था जब मैं किताबों से भरा अपना स्कूल बैग नहीं उठा सकी.

मानव सैलाब

मेरे एक भाई ने बताया कि तालेबान ने अड्डे में बुर्क़ा पहने हुई एक महिला को जाने से रोकने के लिए उन्हें धक्का मारा और वह ज़मीन पर गिर गईं. तालेबान को अब और ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि शरिया लगाने के बाद तो उनकी मांग पूरी हो गई अब वो फिर ऐसा क्यों करते हैं.

मेरे एक भाई ने बताया कि तालेबान ने अड्डे में बुर्क़ा पहने हुई एक महिला को जाने से रोकने के लिए उन्हें धक्का मारा और वह ज़मीन पर गिर गईं. तालेबान को अब और ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि शरिया लगाने के बाद तो उनकी मांग पूरी हो गई अब वो फिर ऐसा क्यों करते हैं.

जब हम बाहर आए तो लोगों की एक भीड़ सड़कों पर निकल आई थी. ऐसा लग रहा था कि एक मानव सैलाब आगे बढ़ रहा है.

किसी के पाँव में जूते नहीं थे तो किसी का दुपट्टा नहीं. किसी ने गठरी उठा रखी थी तो कोई ख़ाली हाथ जा रहा था. पहले तो हमने सोचा हमारी हालत बुरी है, मगर लोगों की ये हालत देखकर हमने अपनी स्थिति पर ख़ुदा का शुक्र अदा किया.

मैने ऐसे लोग भी देखे जिनके पास किराया तक नहीं था. मिंगोरा से निकलते वक़्त हमने क़ुमबर के इलाक़े में तालेबान को देखा जो लोगों को गाड़ियों की लाइट ठीक करने का आदेश दे रहे थे.

तालेबान का आदेश सुनते ही लोग ठिठक जाते थे. मैंने और मेरी सहेली ने उन्हें ट्रैफ़िक तालेबान का नाम दिया.

मेरा भाई रास्ते में बहुत नाराज़-नाराज़ रहा क्योंकि उसके चूज़े घर में ही रह गए थे. उन्होंने चूज़े साथ ले जाने की बहुत ज़िद की लेकिन अम्मी ने कहा कि रास्ते में मर जाएँगे. हम पेशावर से नौशहरा पहुँचे और फिर अगले दिन मानसेहरा से होते हुए शाम तक पहुँच गए.

शाम तक पहुँचे तो फ़ौजियों ने हमें आगे जाने से रोक दिया. मेरी दादी बीमार थीं और दर्द से रो रहीं थीं. हमने बहुत हाथ पाँव जोड़े बड़ी खुशामदें कीं तो फ़ौजियों ने जाने की इजाज़त दे दी.

हम पैदल रवाना हुए फिर एक फ़्लाइंग कोच मिली और हम शांग्ला के लिए रवाना हो गए.

विश्वास

स्वात से विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या लाखों में है

हम इस वक़्त शांग्ला में हैं मगर कैंपों में रहने वाले लोगों की दयनीय स्थिति सुन कर ख़ुदा का शुक्र आदा करते हैं कि हम तो बहुत आराम की हालत में रह रहे हैं. स्वात छोड़ने का दुख हो रहा है क्योंकि मैंने स्वात नहीं बल्कि अपनी पहचान और ज़िंदगी वहाँ छोड़ दी है.

मुझे विश्वास है कि युद्ध तो हमेशा नहीं रहेगा, एक दिन तो उसको ख़त्म होना ही है और मैं वापस जाकर अपनी ज़िंदगी-अपनी पहचान पा लूँगी.

मेरी न तो तालेबान के साथ हमदर्दी है और न ही फ़ौज के साथ, दोनों ने हम पर ज़ुल्म किए हैं.

तालेबान ने हमें बर्बाद करके रख दिया है और फ़ौज हमारे लोगों की हत्या कर रही है.

जिस वक़्त हम स्वात छोड़ कर आ रहे थे तो मेरे एक रिश्तेदार को पीठ में उस वक़्त गोली लगी जब वह अपने बच्चों को फ़ायरिंग से बचाने के लिए उन्हें रसोई में ले जा रहे थे.

मेरे एक भाई ने बताया कि तालेबान ने अड्डे में बुर्क़ा पहने हुई एक महिला को जाने से रोकने के लिए उन्हें धक्का मारा और वह ज़मीन पर गिर गईं.

तालेबान को अब और ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि शरिया लगाने के बाद तो उनकी माँग पूरी हो गई अब वो फिर ऐसा क्यों करते हैं.

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