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कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं उपेक्षा की भेंट चढ़ा नरेगा

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कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं उपेक्षा की भेंट चढ़ा नरेगा

भूरा आदिवासी समुदाय का एक लाचार अधेड़ है. उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश-झारखंड सीमा पर स्थित है उसका गांव कुड़वा. ब्लॉक है चोपन, ज़िला सोनभद्र. वो रोज़गार गारंटी क़ानून के ज़मीनी सच के दूसरे पहलू की सच्चाई हमारे सामने ला रहा है.

रोज़गार गारंटी योजना को जब देशभर में लागू किया जा रहा था तो दिल्ली में अर्थशास्त्रियों का एक हिस्सा ऐसा था जिसने इसका विरोध किया था. उनका तर्क था कि हज़ारों करोड़ रूपए की इस योजना का लोगों को लाभ कम मिलेगा, यह भ्रष्टाचार की भेंट ज़्यादा चढ़ेगी.

(चुनाव के मौसम में जब लोग यूपीए के कार्यकाल की उपलब्धियों की ओर देखते हैं तो सबसे अगली पंक्ति में नाम आता है रोज़गार गारंटी क़ानून का. दुनियाभर में किसी लोकतंत्र का यह अनूठा प्रयोग कई खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ भारत में लागू हो चुका है. तीन बरस का सफ़र तय कर चुका है. चुनाव के मौसम में इस क़ानून के ज़मीनी सच पर हमारी विशेष श्रृंखला की चौथी कड़ी...)

इस तर्क के बावजूद देशभर में योजना लागू हुई. पहली बार ऐसा हुआ था जब किसी योजना को भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से बचाने के लिए क़ानून के अंदर ही पारदर्शिता और जवाबदेही के विशेष प्रावधान रखे गए.

चोरी और अनियमितता न हो, इसके लिए लोगों के भुगतान बैंक खातों के ज़रिए कराने की व्यवस्था बनी. मशीनों से काम लेने पर रोक लगी. पर अनियमितताएं नहीं रुकीं. कहीं न के बराबर तो कहीं जमकर अनियमितताओं के मामले सामने आए.

देश की बाकी योजनाओं की तरह इस योजना का भी कामकाज की उस परिपाटी से साफ़ निकल पाना संभव नहीं था जिसमें दिल्ली से चला 100 रूपया लोगों के बीच पहुंचते पहुंचते 15 रूपए भी नहीं रह जाता.

निराशाजनक प्रदर्शन

हालांकि कुछ राज्यों में इस योजना के लागू होने में काफी ईमानदारी और पारदर्शिता बरती गई पर ऐसा उन्हीं राज्यों में ज़्यादा देखने को मिला है जहाँ ग्राम पंचायत स्तर तक कामकाज में सरकारी जवाबदेही तय करने संबंधी प्रयोग आम लोगों ने किए हैं.

जिन जगहों पर इस क़ानून को लेकर जागरूकता रही है, जहाँ से इस क़ानून के लिए आंदोलन खड़े हुए हैं, और जहाँ सूचना का अधिकार जैसे क़ानून का प्रभावी इस्तेमाल हुआ है, वहाँ रोज़गार गारंटी क़ानून के अंतर्गत बेहतर तरीके से काम हुआ है और अनियमितताएं कम हुई हैं ज्यां द्रेज़, अर्थशास्त्री

जिन जगहों पर इस क़ानून को लेकर जागरूकता रही है, जहाँ से इस क़ानून के लिए आंदोलन खड़े हुए हैं, और जहाँ सूचना का अधिकार जैसे क़ानून का प्रभावी इस्तेमाल हुआ है, वहाँ रोज़गार गारंटी क़ानून के अंतर्गत बेहतर तरीके से काम हुआ है और अनियमितताएं कम हुई हैं

राजस्थान, आंध्र प्रदेश इसके सबसे बेहतर उदाहरण बने हैं पर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल की ओर देखें तो सरकारी आंकड़े भी इस क़ानून के कमज़ोर तरीके से लागू होने की सच्चाई की चुगली करते नज़र आते हैं.

अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ कहते हैं, "जिन जगहों पर इस क़ानून को लेकर जागरूकता रही है, जहाँ से इस क़ानून के लिए आंदोलन खड़े हुए हैं, और जहाँ सूचना का अधिकार जैसे क़ानून का प्रभावी इस्तेमाल हुआ है, वहाँ रोज़गार गारंटी क़ानून के अंतर्गत बेहतर तरीके से काम हुआ है और अनियमितताएं कम हुई हैं."

पर कई राज्यों में अभी भी रोज़गार गारंटी क़ानून को लेकर लोगों के बीच जानकारी न के बराबर है. कहीं अगर यह पता है कि इस तरह का क़ानून है तो इस बात को लोगों को बताने के प्रयास न के बराबर दिखे हैं जिससे लोग जानें कि काम कैसे मांगना है, कहाँ मांगना है, कितना और कैसा काम करना है, भुगतान और जॉबकार्ड कैसे बनवाने हैं. आदि...

यहाँ इस योजना में अनियमितताओं के कुछ प्रमुख पहलुओं की चर्चा करते हैं.

अनियमितताएं

लोगों में नरेगा से संबंधित जानकारी का अभाव है

क़ानून के क्रियान्वयन में अनियमितताओं की एक वजह है लोगों को क़ानून से संबंधित जानकारी का न मिलना. इसकी वजह से कई जगहों पर लोग न तो काम मांग पाए हैं और न उन्हें काम का अवसर मिला है. उनके लिए इस योजना की स्थिति काला अक्षर बराबर ही है.

दूसरा पहलू है सरकारी मशीनरी की सुस्ती का. कुछ जगहों पर लोगों ने काम मांगा, अर्ज़ियां लगाईं, सरकारी अधिकारियों के कार्यालय जा जाकर चप्पलें घिसीं पर काम मिलना संभव नहीं हो सका है. ऐसे कई मामले उत्तर प्रदेश और बिहार में देखने को मिले हैं.

तीसरा पहलू है काम मिलने के बाद भी क़ानून के तहत मिलने वाले भुगतान या सुविधाओं से वंचित रहने का. कहीं भुगतान कम हो पाया है क्योंकि मस्टरोल में अनियमितताएं हुई हैं. कहीं भुगतान महीनों बाद मिला है और क़ानून के तहत कार्यस्थल पर मिलने वाली सहूलियतों से लोग वंचित रहे हैं.

चौथा पहलू बड़े पैमाने पर निचले स्तर पर अधिकारियों, पंचायत सचिवों और ग्राम प्रधानों की मिली भगत के कारण हो रहे भ्रष्टाचार का है. सोनभद्र ज़िले के चोपन ब्लॉक की कुड़वा ग्राम पंचायत में जब हम इसकी बानगी लेने पहुँचे तो ज़मीनी सच रुला देने वाला था.

यहाँ लोगों को काम मिला है पर प्रधान ने लोगों को उनके जॉबकार्ड नहीं दिए हैं और उन्हें अपने पास जमा रखा है. कुछ लोगों को विरोध के बाद कार्ड मिले हैं पर उनमें फ़र्जी जानकारी भरकर पैसा निकाला जा चुका है. लोगों को उनके खातों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

कैसे रुकेगा भ्रष्टाचार

जिलाधिकारी से बात करने पर उन्होंने क्षेत्र में नए होने की दुहाई दी और इस अंदरूनी इलाके में जाँच करवाने का वादा किया.

इस आदिवासी बाहुल्य इलाके के गांववालों ने बताया कि कई लोगों को एक साल से भी ज़्यादा समय से कोई भुगतान नहीं मिला है. लोगों के कई जॉबकार्ड ऐसे हैं जिनमें ग़लत जानकारी दर्ज है और पैसा निकाला जा चुका है.

बीडीओ का घेराव करने के बाद उनकी अनुमति से ही गांववालों ने एक सर्वेक्षण भी किया है जिससे सामने आया है कि केवल इसी ग्राम पंचायत का 13 लाख से ज़्यादा भुगतान लोगों को नहीं मिला है.

"काम बहुत कम दिनों मिला है. जॉबकार्ड का अबतक पता नहीं है. प्रधान से पूछो तो कहती हैं कि जाओ, जला दिया. पैसा खाते से निकाल लिया जा रहा है. काम की जगह पर न पीने का पानी है, न दवा, न छोटे बच्चों के लिए कुछ राहत. शिकायत करो तो प्रधान और उनके परिवार के लोग कहते हैं कि राजनीति मत करो, गंदी गालियां देते हैं और एक-दो बार धक्का देकर भगा भी दिया है किस्मतिया देवी

"काम बहुत कम दिनों मिला है. जॉबकार्ड का अबतक पता नहीं है. प्रधान से पूछो तो कहती हैं कि जाओ, जला दिया. पैसा खाते से निकाल लिया जा रहा है. काम की जगह पर न पीने का पानी है, न दवा, न छोटे बच्चों के लिए कुछ राहत. शिकायत करो तो प्रधान और उनके परिवार के लोग कहते हैं कि राजनीति मत करो, गंदी गालियां देते हैं और एक-दो बार धक्का देकर भगा भी दिया है

कई मामलों में तो बुज़ुर्ग और लाचार लोगों के नाम से बने कार्डों से पैसा निकालने का मामला सामने आया है.

हालांकि ग्राम प्रधान कबूतरी देवी ने बीबीसी को बताया कि ऐसा एक साजिश के तहत उन्हें बदनाम करने के लिए किया जा रहा है पर यह पूछने पर कि जिन लोगों ने उन्हें वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुना, आज वे उनके ख़िलाफ़ साजिश क्यों कर रहे हैं, इसपर वो कुछ स्पष्ट जवाब नहीं दे पाती हैं.

गांव की ही एक महिला किस्मतिया देवी बताती हैं, "काम बहुत कम दिनों मिला है. जॉबकार्ड का अबतक पता नहीं है. प्रधान से पूछो तो कहती हैं कि जाओ, जला दिया. पैसा खाते से निकाल लिया जा रहा है. काम की जगह पर न पीने का पानी है, न दवा, न छोटे बच्चों के लिए कुछ राहत. शिकायत करो तो प्रधान और उनके परिवार के लोग कहते हैं कि राजनीति मत करो, गंदी गालियां देते हैं और एक-दो बार धक्का देकर भगा भी दिया है."

ठीकरा व्यवस्था के सिर

कुड़वा ग्राम पंचायत की यह तस्वीर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के बड़े हिस्से की सच्चाई है. हालांकि इन राज्यों में काम कर रहे लोग बताते हैं कि तीन सालों में स्थितियां बदली भी हैं और अब सुधार आना शुरू हुआ है क्योंकि जागरूकता बढ़ी है.

पर सामाजिक कार्यकर्ता ऋतिका खेड़ा बताती हैं, "अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से लड़ते हुए और योजना को सही तरीके से लागू कराने का प्रयास करते हुए तीन सामाजिक कार्यकर्ता अपनी जान दे चुके हैं. कितने ही लोगों के साथ मारपीट हुई है, धमकियां मिली हैं. झारखंड में ये जो हो रहा है, ऐसा बाकी राज्यों में भी देखने को मिल जाएगा. सरकारी मशीनरी इस क़ानून के प्रति ज़िम्मेदार कब होगी."

ज़्यां द्रेज़ एक और इशारा करते हैं, "हम मानते हैं कि इस क़ानून में भी भ्रष्टाचार हो रहा है पर इसे रोकने की ज़रूरत है. सरकारें और प्रशासन इसके प्रति गंभीर बनें. क़ानून के विरोधी भी इस भ्रष्टाचार को आधार बनाकर इस क़ानून की आलोचना करेंगे पर सबको समझना होगा कि भ्रष्टाचार की समस्या से केवल नरेगा ही नहीं जूझ रहा है. पूरी व्यवस्था इससे प्रभावित है. इसे नरेगा के ख़िलाफ़ इस्तेमाल न किया जाए."

अनियमितताओं की कहानियां इतनी हैं कि उन्हें बताने में कई पन्ने भरे जा सकते हैं. रोज़गार गारंटी क़ानून भी इससे अछूता नहीं रहा है. लोगों को इंतज़ार है कि भ्रष्टाचार का भूत कब रास्ते से हटे और लाभ उनतक पहुँचे. लाभ चाहे रोज़गार गारंटी योजना का हो या किसी और सरकारी नियम, क़ानून, सुविधा, सहायता, योजना का.

इंतज़ार जारी है, अंतिम व्यक्ति की सूखी पथराई आंखों में....

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