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रोज़गार गारंटीः मंदी में बाज़ार की संजीवनी

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रोज़गार गारंटीः मंदी में बाज़ार की संजीवनी

बाबूलाल कोठारी राजस्थान के एक पिछड़े ज़िले राजसमंद में भीम तहसील के रहनेवाले हैं. पेशे से स्वर्णकार है. अपनी जेवरों की दुकान पर पीढ़ियों से इलाके के लोगों को सोने-चांदी के आभूषण देते आए हैं.

पर ऐसा क्या हुआ इन दो बरसों में कि बाबूलाल कोठारी मंदी में भी मुनाफ़ा कमा रहे हैं. उनकी दुकान पर ख़रीदारों की भीड़ है.

बाबूलाल बताते हैं, "रोज़गार गारंटी योजना के तहत लोगों को बहुत काम मिला है और इस योजना में सबसे ज़्यादा काम महिलाओं ने किया है. घर की बाक़ी ज़रूरतों के लिए तो उन्हें पैसा मिला ही, अपने जेवर-गहने की हसरतें भी वे पूरी कर रही हैं जिनके लिए वे बरसों से अपने पतियों से कह रही थीं और पति टालते जा रहे थे."

(चुनाव के मौसम में जब लोग यूपीए के कार्यकाल की उपलब्धियों की ओर देखते हैं तो सबसे अगली पंक्ति में नाम आता है रोज़गार गारंटी क़ानून का. दुनियाभर में किसी लोकतंत्र का यह अनूठा प्रयोग कई खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ भारत में लागू हो चुका है. तीन बरस का सफ़र तय कर चुका है. चुनाव के मौसम में इस क़ानून के ज़मीनी सच पर हमारी विशेष श्रंखला की दूसरी कड़ी...)

बाबूलाल कोठारी की यह स्थिति अमूमन बाज़ार के कई व्यापारियों की है. राज्य में रोज़गार गारंटी योजना के तहत इतना पैसा आया है कि जितना कभी किसी ज़िले या पंचायत स्तर पर लोगों को नहीं मिला था.

रोज़गार गारंटी योजना के तहत लोगों को बहुत काम मिला है और इस योजना में सबसे ज़्यादा काम महिलाओं ने किया है. घर की बाक़ी ज़रूरतों के लिए तो उन्हें पैसा मिला ही, अपने जेवर-गहने की हसरतें भी वे पूरी कर रही हैं जिनके लिए वे बरसों से अपने पतियों से कह रही थीं और पति टालते जा रहे थे बाबूलाल कोठारी, आभूषण विक्रेता

रोज़गार गारंटी योजना के तहत लोगों को बहुत काम मिला है और इस योजना में सबसे ज़्यादा काम महिलाओं ने किया है. घर की बाक़ी ज़रूरतों के लिए तो उन्हें पैसा मिला ही, अपने जेवर-गहने की हसरतें भी वे पूरी कर रही हैं जिनके लिए वे बरसों से अपने पतियों से कह रही थीं और पति टालते जा रहे थे

इस पैसे की आमद का असर बाज़ार पर दिख रहा है. बाबूलाल बताते हैं, "अधिकतर ख़रीदार उस वर्ग के हैं जो कि ग़रीब हैं, मजदूरी करते हैं और जिन्हें अब अरसे बाद एकमुश्त पैसा हाथ में मिला है. इन घरों में लोहे के बक्से ख़रीदे जा रहे हैं. शाम के खाने में केवल प्याज़-रोटी नहीं, सब्ज़ी भी अब बन ही जाती है."

बाबूलाल कोठारी भाजपा समर्थक हैं. रोज़गार गारंटी क़ानून यूपीए की देन है पर विचारधारा या खेमे से ऊपर उठकर बाबूलाल व्यवहारिक पहलू की बात कर रहे हैं. मुनाफ़ा उन्हें दिखाई दे रहा है. ज़ोर देकर कहते हैं कि केवल मजदूर नहीं, व्यापारी को भी इसका लाभ मिल रहा है इसलिए हम व्यापारी भी इसका समर्थन करेंगे.

जीवन स्तर में सुधार

देश के जिन राज्यों में रोज़गार गारंटी का क़ानून सबसे प्रभावी तरीके से लागू हुआ है उनमें सबसे ऊपर नाम आता है राजस्थान का.

राज्य के अजमेर ज़िले में रोज़गार गारंटी योजना के तहत मिले काम की थाह लेते वक़्त हमने बात की वहाँ के जिला पंचायत अधिकारी से और पूछा कि वार्षिक स्तर पर कितना पैसा इस योजना के तहत ज़िले को मिल रहा है.

राजस्थान में इस योजना का क्रियान्वयन सबसे बेहतर तरीके से हुआ है

ताज़ा आंकड़ों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि लगभग 330 करोड़ रूपए केवल अजमेर के लोगों को इस योजना के तहत मिले हैं और वो भी एक वित्तीय वर्ष (2008-09) में.

इसमें से 250 करोड़ के आसपास की राशि तो मजदूरी के रूप में भुगतान की गई है. 100 की मजदूरी के प्रावधान की तुलना में 93 कार्यदिवसों के औसत के साथ ढाई लाख से ज़्यादा परिवार इस योजना के तहत लाभान्वित हुए हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे बताते हैं, "निःसंदेह किसी भी ज़िले में इससे पहले इतना पैसा किसी योजना के तहत एक साल में नहीं आया. कई बार तो राज्य का सूखा राहत कार्यक्रम का कुल बजट इसके आसपास होता था. अब इतना पैसा एक ज़िले में आ रहा है और सीधे लोगों की जेब में पहुँच रहा है."

वो बताते हैं, "इसका सीधा असर बाज़ार पर और निम्न वर्ग के जीवन स्तर पर देखने को मिल रहा है. ग्रामीणों को सीधे उनके हाथ में पैसा मिलना शुरू हुआ है. मजदूरी का भुगतान बैंकों के ज़रिए हो रहा है और इसकी वजह से चोरी या अनियमितता की गुंजाइश कम हुई है. लोगों को तय मजदूरी मिली है. इसका असर उनके खानपान, ज़रूरत के सामान की क्रय क्षमता, बच्चों की पढ़ाई और पहनावे तक पर दिखाई देता है."

निःसंदेह किसी भी ज़िले में इससे पहले इतना पैसा किसी योजना के तहत एक साल में नहीं आया. कई बार तो राज्य का सूखा राहत कार्यक्रम का कुल बजट इसके आसपास होता था. अब इतना पैसा एक ज़िले में आ रहा है और सीधे लोगों की जेब में पहुँच रहा है निखिल डे, सामाजिक कार्यकर्ता

निःसंदेह किसी भी ज़िले में इससे पहले इतना पैसा किसी योजना के तहत एक साल में नहीं आया. कई बार तो राज्य का सूखा राहत कार्यक्रम का कुल बजट इसके आसपास होता था. अब इतना पैसा एक ज़िले में आ रहा है और सीधे लोगों की जेब में पहुँच रहा है

अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ कहते हैं, "जिस सतत विकास की बात हम दिल्ली में बैठकर करते हैं उसकी तस्वीर बदलने के लिए ज़रूरी है कि हम इस योजना को और प्रभावी बनाएं और प्रति परिवार की जगह प्रति व्यक्ति 100 दिन की गारंटी देना शुरू करें क्योंकि जबतक अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर नहीं बदलेगा, सुधार और विकास की बातें अधूरी रहेंगी."

राजस्थान के राजसमंद ज़िले का एक गांव है, देवडूंगरी और यहाँ बदामी बाई का परिवार रहता है. परिवार में बदामी के पति हैं, दो बच्चे हैं, सभी कृषि पर आश्रित.

इस बरस फसल के नाम पर दाना नहीं मिला. पर रोज़गार गारंटी योजना ने इस परिवार को पाला है, दोनों बच्चे स्कूल जा रहे हैं. लाचार पति के साथ बदामी को पलायन या दूसरों की कृपा पर जीने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ा है.

देश के कितने ही परिवार अभी भी संकट और अभाव की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं पर कुछ परिवारों की कहानी बदली है और यह बदलाव आया है रोज़गार गारंटी योजना की बदौलत. बदामी इसकी बानगी है.

कल चर्चा करेंगे रोज़गार गारंटी योजना में मजदूरों, दलितों और महिलाओं की स्थिति में आए बदलावों की...

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