विरोधियों को चित करने के लिए 'राजनीतिक जासूसी'

नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। लोकसभा चुनाव में विरोधियों को पटकनी देने के लिए नेता हर दांवपेंच अपनाने के साथ ही 'राजनीतिक जासूसी' का सहारा ले रहे हैं। यही वजह है कि देश के चुनाव में पहली बार निजी जासूसी एजेंसियों की सेवाएं लेने का एक दौर चल पड़ा है।

उदाहरण के लिए देश की दो बड़ी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में से एक के शीर्ष नेता ने एक निजी गुप्तचर संस्था की सेवा ले रखी है ताकि वह अपने सहकर्मियों के साथ-साथ विरोधी दलों के नेताओं की हरकतों पर नजर रख सकें। इन सभी नेताओं को चुनाव के बाद आंकड़ों के खेल में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व अधिकारी और एक जासूसी एजेंसी के प्रमुख वी. एम. पंडित कहते हैं, "मतदान खत्म होने के बाद ही हमारा असली काम शुरू हुआ है।"

एक सूत्र के मुताबिक यह एजेंसी एक काम के लिए 20 लाख रुपये से ज्यादा शुल्क लेती है। इस एजेंसी के लगभग 20 जासूस संबंधित दलों के भीतर घुस चुके हैं। इनका काम कुछ संबधित नेताओं और उनके सहयोगियों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर नजर रखना और अपने ग्राहक नेता को सतर्क करते रहना है।

पंडित की एजेंसी को दो महीने पहले यह काम मिला था। उनका कहना है, "हमें अपने ग्राहक को राजनीति के खेल में सबसे आगे रखना पड़ता है।"

पंजाब पुलिस के अवकाश प्राप्त पुलिस निरीक्षक सी. पॉल का कहना है कि जमीनी स्तर की खुफिया जानकारी एकत्र करने की खातिर एक एजेंट को आठ घंटों के लिए 10,000 से 15,000 रुपये की रकम अदा करनी पड़ती है। पाल खुद एक निजी जासूसी एजेंसी के प्रमुख हैं।

वह बताते हैं, "हमारे आदमी कुछ इलाकों में होने वाली बैठकों और आम परिचर्चा में अपने आंख व कान खुले रखते हैं। वे सूचनाएं एकत्र करते हैं और फिर उनका मिलान करते हैं। इसके बाद इन सूचनओं को ग्राहक तक पहुंचाया जाता है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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