हरिद्वार को उत्तराखंड में मिलाया जाना जायज : सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली, 8 मई (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायायल ने हरिद्वार को उत्तराखंड में मिलाए जाने को जायज ठहराया है। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तराखंड का गठन किया गया था।
न्यायमूर्ति एस.बी.सिन्हा और साइरिक जोसेफ की एक पीठ ने हरिद्वार को उत्तराखंड में मिलाने पर वैधता की मुहर लगाते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद तीन के तहत संसद जिन राज्यों की सीमाओं को घटाना-बढ़ाना चाहती है उसे केवल उनकी विधानसभाओं से सलाह करनी होगी। उसका उसके विचारों से सहमत या असहमत होना कोई मायने नहीं रखता।
पीठ ने यह फैसला मंगलवार को हरिद्वार के निवासियों के एक समूह द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया। नागरिकों ने उत्तराखंड पुनर्गठन अधिनियम 2000 के अनुच्छेद तीन को चुनौती देते हुए यह याचिका दायर की थी। इस अधिनियम के तहत उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित एक प्रस्ताव के विपरीत हरिद्वार को उत्तराखंड में शामिल किया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय से कहा, "किसी नए राज्य के गठन से संबंधित विधेयक पेश करने की शक्ति संसद के हाथ में है। हालांकि प्रभावित राज्य की विधानसभा से चर्चा करना आवश्यक है लेकिन इसकी सलाह संसद पर बाध्यकारी नहीं है।"
हरिद्वार के निवासियों का कहना था कि पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने नए राज्य के गठन के प्रस्तावित कानून को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विचारार्थ भेजा था लेकिन केंद्र सरकार उसमें हरिद्वार का नाम देना भूल गई।
बाद में मार्च 2000 में गलती को सुधारते हुए सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर कहा कि हरिद्वार कस्बा नए राज्य में शामिल किया जाएगा। बाद में उसने राज्य विधानसभा से कहा कि वह अप्रैल तक उसे अपने विचार से अवगत कराए।
उत्तर प्रदेश विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि हरिद्वार जिले का कोई हिस्सा नए राज्य में शामिल नहीं किया जाएगा लेकिन केंद्र सरकार ने इसकी अनदेखी कर दी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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