नंदीग्राम में शहीद चौक...

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नंदीग्राम में शहीद चौक...

जब मैं वहाँ पहुँचा तो मुझे सड़क पर एक-दो नहीं बल्कि कई जगह कई स्मारक नज़र आते रहे. लेकिन मेरी नज़र एक छोटे से स्मारक पर जा कर ठहर गई जहाँ एक महिला बैठी थी. लोगों ने बताया कि बेटे के गुज़र जाने के बाद उस महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है और वह रोज़ ऐसे ही दिन भर बैठी रहती है.

ये भाव विह्वल करने वाला दृश्य था. मैंने सोचा कि शायद उस महिला का दर्द बाँटा जाए पर जब सामने पहुँचा तो मेरे शब्द ग़ायब...और उसकी आँखों में सिर्फ़ आंसू ही आंसू....

मुझे लगा कि वो फट पड़ेगी....मेरे पास कोई विकल्प नहीं था....आगे बढ़ गया...........लेकिन अचानक हलचल हुई और तेज़ रफ़्तार से कई पुलिस की गाड़ियाँ सन्नाटे को चीरती निकल गईं.

शोर हुआ कि आगे जहाँ वोट पड़ रहा है वहाँ गोलियाँ चल रही हैं. बेपरवाह होकर मैं भी पहुँचा जहाँ से धमाकों की आवाज़ें आ रही थीं. पहुँचते ही लोगों ने कहा अब और आगे नहीं.....आगे बूथ लूटा जा रहा है.

चौदह मार्च को मारे गए लड़के की माँ बदहाल रोती रहती है

नहर के एक तरफ़ सशस्त्र पुलिस तैनात थी. पीछे नंगे बदन बच्चे, बूढ़े महिलाओं की भीड़ थी.

भीड़ पुलिस से कह रही थी कि कुछ करो, पर पुलिस और पुलिस, और ज्यादा पुलिस के आने का इंतज़ार करती रही.

एक लड़का सामेने आया नंगे बदन. चौदह मार्च 2007 को पुलिस फ़ायरिंग के दौरान हुई फ़ायरिंग के छर्रों के निशान उसके पैरों मे थे. उसे बताया कि उसने एक लाश भी उठाई थी.

नहर के दोनों तरफ़ वोट तो पड़ रहे थे पर उस पार धमाके व गोलियों के बीच.

मुझे चार्ल्स डार्विन का कहा याद आया कि 'सबसे योग्य ही टिकते हैं'. पर यहाँ संघर्ष में योग्य कौन....?

नंदीग्राम से लौटते हुए. मेरे सामने उस महिला का चेहरा था...... डरा और मायूस.......

और अनगिनत सवालों से भरी ताकती आँखें मेरी और........न उसके पास ज़मीन है और न ही बेटा......

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