'भारत ने डाला था नेपाल पर दबाव '

नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के वरिष्ठ नेता गौरव ने आरोप लगाया है कि जनरल कटवाल को ना हटाने के लिए भारत की ओर से दबाव था. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी की यह धारणा रही है कि वो भारत और चीन के साथ समान संबंध चाहते हैं. सांस्कृतिक तौर पर वो भारत के करीब हैं लेकिन नेपाल पर किसी भी तरह के बाहरी दबाव को वो स्वीकार नहीं करेंगे.
यह पूछे जाने पर कि प्रचंड के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़े के बाद अब उनकी पार्टी का शांति प्रक्रिया के प्रति क्या रुख़ रहेगा, गौरव ने कहा, "नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) शांति प्रक्रिया को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के प्रति कटिबद्ध है. इसका मतलब है कि दोनों सेनाओं का समायोजन करवाना, यानि राजशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल रहे सशस्त्र माओवादी और अन्य विद्रोहियों को राष्ट्रीय सेना में शामिल कर के एक नयी राष्ट्रीय सेना का गठन."
लेकिन यह पूछे जाने पर कि अगर यह शर्त पूरी नहीं होती तो क्या वो नयी गठबंधन सरकार को समर्थन नहीं देंगे तो इसका सीधा जवाब दिए बिना उन्होंने कहा, "दो सेनाओं का समायोजन तो शांति प्रक्रिया का अभिन्न अंग है. दो विरोधी स्वाभाव की सेनाओं के रहते स्थायी शांति कैसे बन सकती है. इसका समाधान इन दोनों सेनाओं को मिला कर एक नयी सेना का गठन ही है."
'राष्ट्रपति का असंवैधानिक क़दम'
मौजूदा हालात में अब नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की क्या भूमिका होगी, ये पूछे जाने पर गौरव ने कहा कि नेपाल के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के आदेश पर हटाए गए सेनाध्यक्ष जनरल कटवाल को बहाल करके असंवैधानिक क़दम उठाया है क्योंकि सेनाध्यक्ष को हटाना या नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति करना सरकार का अधिकार होता है.
दो सेनाओं का समायोजन तो शांति प्रक्रिया का अभिन्न अंग है. दो विरोधी स्वाभाव की सेनाओं के रहते स्थायी शांति कैसे बन सकती है. इसका समाधान इन दोनों सेनाओं को मिला कर एक नयी सेना का गठन ही है. गौरव, नेपाल के वरिष्ठ माओवादी नेता
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उन्होंन कहा कि राष्ट्रपति ने लोकतंत्र को दरकिनार कर के तानाशाही की ओर कदम उठाया है जो माओवादी कभी स्वीकार नहीं करेंगे. गौरव ने कहा कि अब इसे नियंत्रण में लाना उनकी पार्टी का एक बड़ा एजेंडा होगा और इसे वो सदन में भी उठाएंगे.
गौरव ने मीडिया में उठाए गए इन आरोपों का खंडन किया कि जनरल कटवाल को हटा कर कुल बहादुर खड़का को सेनाध्यक्ष बनाने की कोशिश इसलिए की गई क्योंकि खड़का माओवादियों के करीबी माने जाते थे. उन्होंने कहा दोनो की नियुक्ति और पदोन्नतियां राजतंत्र के दौरान हुई थीं.


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